Wednesday, November 4, 2020

राजस्थान का भील जनजाति आन्दोलन ( Bhil tribe movement of Rajasthan)


राजस्थान का भील जनजाति आन्दोलन

▶ राष्ट्रीय विचारधारा से प्रभावित कुछ ऐसे जन-सेवक पैदा हुए, जिन्होंने इन जातियों में जागृति का शंख फूंका और इन्हें अपने अधिकारों का भान कराया। ऐसे जन-सेवकों में प्रमुख थे स्वनामधन्य 'गुरुगोविन्द'

 ▶ श्री गोविन्द का जन्म सन् 1858 में डूंगरपुर राज्य के बांसिया ग्राम में एक बनजारे के घर में हुआ था। उन्होंने एक गाँव के पुजारी की सहायता से अक्षरज्ञान प्राप्त किया।

▶ वे स्वामी दयानन्द सरस्वती की प्रेरणा से युवावस्था में ही जन-जातियों की सेवा में जुट गये। उन्होंने आदिवासियों की सेवा हेतु सन् 1883 में सम्प सभा की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने मेवाड़, डूंगरपुर, ईडर, गुजरात, विजयनगर और मालवा के भील और गरासियों को संगठित किया। उन्होंने एक ओर उक्त जातियों में व्याप्त सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों को दूर करने का प्रयत्न किया तो दूसरी ओर उनको अपने मूलभूत अधिकारों का अहसास कराया। वे शीघ्र ही इन जातियों में लोकप्रिय हो गये। लोग उन्हें श्रद्धा से गुरु गोविन्द के नाम से सम्बोधित करने लगे।

▶ गरु गोविन्द ने सम्प सभा का प्रथम अधिवेशन सन् 1903 में गुजरात में लिया की पहाड़ी पर किया। इस अधिवेशन में गुरु गोविन्द के प्रवचनों से प्रभावित होकर भील-गरासियों ने शराब छोड़ने, बच्चों को पढ़ाने और आपस के झगडे अपनी जा ही निपटाने की शपथ ली। गुरु गोविन्द ने उन्हें बैठ-बेगार और गैरवाजिब लागने के लिये आह्वान किया। इस प्रकार हर वर्ष आश्विन शुक्ला पूर्णिमा को मानागढ की पसार पर सम्प सभा का अधिवेशन होने लगा। भील गारसियों में दिन-प्रति-दिन बढती हुई जा से आस-पास की रियासतों के शासक सहम उठे। उन्हें भय हो गया कि ये जनजाति सुसंगठित होकर भील राज्य की स्थापना करेगी। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से प्रार्थना की कि भीलों के इस संगठन को सख्ती से दबा दिया जाये।

▶हर वर्ष की भाँति सन 1908 की आश्विन शुक्ला पूर्णिमा को मानगढ़ की पहाड़ी पर सम्प-सभा का विराट् अधिवेशन हुआ, जिसमें भारी संख्या में भील स्त्री-पुरुष शामिल हुए। मानगढ़ की पहाड़ी चारों ओर से ब्रिटिश सेना द्वारा घेर ली गयी। उसने भीड़ पर गोलियों की बौछार कर दी। फलस्वरूप 1500 आदिवासी घटनास्थल पर ही शहीद हो गये और हजारों घायल हो गए। गुरु गोविन्द और उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर लिया गया। गुरु गोविन्द को अदालत द्वारा फाँसी की सजा दी गयी। मगर भीलों में प्रतिक्रिया होने के डर से सरकार ने उनकी यह सजा 20 वर्ष के कारावास में बदल दी, पर वे 10 वर्ष बाद ही रिहा कर दिये गये। गुरु गोविन्द ने अपना शेष जीवन गुजरात के कम्बोई नामक स्थान पर बिताया। 75 से अधिक वर्ष बीत जाने के बावजूद आज भी भील लोग गुरुगोविन्द की याद में मानागढ़ की पहाड़ी पर हर वर्ष आश्विन शुक्ला पूर्णिमा को एकत्र होकर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
▶ राजस्थान के आदिवासियों में गुरु गोविन्द के बाद जिनको सबसे अधिक स्मरण किया जाता है, वे हैं, स्व. श्री मोतीलाल तेजावत।

▶ सन् 1886 में मेवाड़ के आदिवासी क्षेत्र फलासिया के कोलियारी ग्राम में एक ओसवाल परिवार में उत्पन्न श्री तेजावत उस जमाने के मुताबिक थोड़ा बहुत पढ़-लिखकर झाड़ोल ठिकाने के कामदार बन गये। परन्तु थोड़े ही समय में ठिकाने और सरकार द्वारा आदिवासियों पर ढाये जाने वाले जुल्मों से उद्वेलित होकर उन्होंने ठिकाने की नौकरी को तिलांजलि दे दी। वे अब आदिवासियों की सेवा में तल्लीन हो गये।

▶ उन्होंने सन् 1921 झाडोल, कोटड़ा, मादड़ी आदि क्षेत्रों के भीलों को जागीरदारों द्वारा ली जाने वाली बैठ-बेगार और लाग-बागों के प्रश्न को लेकर संगठित किया। धीरे-धीरे यह आन्दोलन सिरोही, दांता, पालनपूर, ईडर, विजयनगर आदि राज्यों में फैल गया।

▶ श्री तेजावत ने बैठ-बेगार और लाल-बाग समाप्त करने सम्बन्धी मांगों को लेकर आस-पास की रियासतों के भीलों का एक विशाल सम्मेलन विजयनगर राज्य के नीमड़ा गाँव में आयोजित किया। मेवाड और अन्य पडोसी राज्यों की सरकारें भीलों में बढ़ती हुई जागति से भयभीत हो गयीं। अत: उक्त राज्यों की सेनायें भीलों के आन्दोलन को दबान के लिये नीमड़ा पहुँच गयीं। वहाँ पर विभिन्न राज्यों के अधिकारियों ने एक ओर भील प्रतिनिधियों को समझौता वार्ता में उलझाया और दूसरी ओर सेना ने सम्मेलन को घेर कर गोलियां चलाना आरम्भ कर दिया। इस नर-संहार में 1200 भील मारे गये और हजारों घायल हो गये |

▶ भील नेता तेजावतजी स्वयं पैर में गोली लगने से घायल हो गये। लोग उन्हें उठाकर सुरक्षत स्थान पर ले गये। मेवाड. सिरोही आदि राज्यों की पलिस ने उनकी गिरफ्तारी के लिये अनेक प्रयत्न किये पर उन्हें सफलता नहीं मिली। अन्त में 8 वर्ष बाद सन् 1929 में महात्मा गाँधी की सलाह पर तेजावतजी ने अपने आपको ईडर पलिस, के सपर्द कर दिया। वहाँ से उन्हें मेवाड लाया गया, जहाँ वे 7 वर्ष तक सेन्ट्रल जेल, उदयपुर में कैद रहे। उन्हें सन् 1936 में जेल से तो रिहा कर दिया गया, पर उदयपुर में नजरबन्द कर दिया गया।

▶सन् 1942 में उन्हें 'भारत छोडो' आन्दोलन के दौरान पुनः जेल में बन्द कर दिया गया। सन् 1945 में उन्हें जेल से रिहा किया गया, पर फिर उनके उदयपुर से बाहर जाने पर पाबन्दी लगा दी गयी जो देश के आजाद होने तक चालू रही। उन्होंने अपना शेष जीवन सामाजिक सेवाओं में गुजारा। उनका देहान्त 5 दिसम्बर, सन् 1963 को हुआ।

▶भील-गरासियों के लिये देश की आजादी के पूर्व अन्य जिन जन-सेवकों ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया, उनमें प्रमुख थे- सर्वश्री माणिक्यलाल वर्मा, भोगीलाल पांड्या, मामा बालेश्वर दयाल, बलवन्तसिंह मेहता, हरिदेव जोशी एवं गौरीशंकर उपाध्याय। उन्होंने भील क्षेत्रों में जगह-जगह शिक्षण संस्थायें, प्रौढ़ शालायें और होस्टल आदि स्थापित कर भील और गरासियों में नये जीवन का संचार किया


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