Skip to main content

Posts

Showing posts from 2015

राजस्थान के प्रमुख लोक देवता【RAJASTHAN KE PRAMUKH LOK DEVTA】

राजस्थान के  प्रमुख लोक देवता【RAJASTHAN KE PRAMUKH LOK DEVTA】 राजस्थान के लोकदेवता मारवाड़ के पंच वीर – 1. रामदेवजी 2. पाबूजी 3. हड़बूजी 4. मेहाजी मांगलिया 5. गोगाजी 1. रामदेवजी उपनाम – रामसापीर, रूणेचा के धणी, बाबा रामदेव जन्म – उडूकासमीर (बाड़मेर), 1405 ई. भादवा पिता – अजमाल जी तँवर (रूणेचा के ठाकुर) माता – मैणादे पत्नी – नेतलदे घोड़े का नाम – लीला इसीलिए इन्हें लाली रा असवार कहते हैं। गुरू – बालीनाथ या बालकनाथ विशेषताएँ – भैरव नामक राक्षस को मारा तथा पोकरण कस्बे को बसाया, कामडिया पंथ की स्थापना की, अछूत मेघवाल जाति की डालीबाई को बहिन माना, मुस्लिम रामसापीर की तरह पूजते हैं। नेजा – रामदेवजी के मन्दिर की पंचरंगी ध्वजा। जम्मा – रामदेवजी का जागरण। चैबीस बाणियाँ – रामदेवजी की रचना। रिखिया – रामदेवजी के मेघवाल भक्त। रूणेचा में रामदेवजी की समाधि पर प्रतिवर्ष भाद्र पद शुक्ला द्वितीया से एकादशी तक विशाल मेला भरता है। यह राजस्थान में साम्प्रदायिक सद्भाव का प्रतीक है। यहाँ कामड़ जाति की महिलाएँ तेरहताली का नृत्य करती है। रामदेवजी के प्रमुख मन्दिर – रामदेवरा – जैसलमेर बराडि

Rajasthan's Lokdevis-राजस्थान की लोक देवियाॅ

Rajasthan's Lokdevis-राजस्थान की लोक देवियाॅ 1. करणीमाता मंदिर देशनोक बीकानेर – बीकानेर राठौड़ शासकों की कुलदेवी, चारणीदेवी व चूहों की देवी के रूप में प्रसिद्ध, सफेद चूहे काला कहलाते हैं। जन्म का नाम रिदू बाई विवाह – देवा के साथ, जन्म का स्थान सुआप (बीकानेर) बीकानेर राज्य की स्थापना इनके संकेत पर राव बीका द्वारा की गई। वर्तमान मंदिर का निर्माण महाराजा सूरज सिंह द्वारा। 2. जीणमाता मंदिर - जन्म – रैवासी (सीकर) शेखावाटी क्षेत्र की प्रमुख देवी, चौहान राजपूतों की कुल देवी, ढाई प्याला मदीरा पान की प्रथा, चैत्र व अश्विन माह में मेला, भाई – हर्ष, मंदिर का निर्माण पृथ्वीराज चैहान प्रथम के काल में। 3. कैला देवी: त्रिकूट पर्वत पर, काली सिंध नदी के तट पर मंदिर, यदुवंशी राजवंश (करौली) की कुल देवी, मंदिर निर्माण गोपाल सिंह द्वारा। नरकासुर राक्षस का वध, चैत्र मास में शुक्ल अष्टमी को लख्खी मेला, लागुरई गीत प्रसिद्ध। 4. शिला देवी: मन्दिर आमेर में, अष्टभूजी महिषासुर मदरनी की मूर्ति, पूर्वी बंगाल विजय के उपरान्त आमेर शासक मानसिंह प्रथम द्वारा जससौर से लाकर स्थापित की गई। वर्तमान मंद

The major historical fort of Rajasthan -राजस्थान के प्रमुख ऐतिहासिक किले दुर्ग

The major historical fort of Rajasthan -राजस्थान के प्रमुख ऐतिहासिक किले(दुर्ग) 1. माण्डलगढ़ दुर्ग: यह मेवाड़ का प्रमुख गिरी दुर्ग है। जो कि भीलवाड़ा के माण्डलगढ़ कस्बे में बनास, मेनाल नदियों के संगम पर स्थित है। इसकी आकृति कटारे जैसी है।  2. शेरगढ़ का दुर्ग (कोषवर्धन): यह बारां जिले में परवन नदी पर स्थित है। राजकोष में निरन्तर वृद्धि करने के कारण इसका नाम कोषवर्द्धन पड़ा। यहाँ पर खींची चौहान शासक, डोड परमार नागवंशीय क्षेत्रीय शासकों, कोटा के हाडा शासक आदि का शासन रहा। शेरशाह सूरी ने इसका नाम परिवर्तित करके शेरगढ़ रखा। महारावल उम्मेद सिंह के दीवान जालिम सिंह झाला ने जीर्णोंदार कर अनेक महल बनवाये जो झालाआं की हवेली के नाम से प्रसिद्ध है। 3. कुचामन का किला: नागौर जिले की नावां तहसील के कुचामन में स्थित है। यह जोधपुर शासक मेडतिया शासकों का प्रमुख ठिकाना था। मेडतिया शासक जालीम सिंह ने वनखण्डी महात्मा के आशीष से इस किले की नीवं रखी। इस किले में सोने के बारीक काम के लिए सुनहरी बुर्ज प्रसिद्ध है तथा यहाँ पर स्थित हवामहल राजपूती स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। इसे जागीरी किलों का सिरमौर क

SUVRNA GIRI JALORE FORT-सुवर्ण गिरि दुर्ग ( जालोरदुर्ग)

सुवर्ण गिरि दुर्ग ( जालोर दुर्ग) ,JALORE FORT यह दुर्ग मारवाङ मे सुकङी नदी के दाहीने किनारे कनकाचल सुवर्ण गिरी पहाङी पर स्थित हैं।ङाँ दशरथ शर्मा के अनुसार प्रतिहार नरेश नागभटट् प्रथम ने इस दुर्ग का निर्माण करवाया था । वीर कान्हडदेव सोनगरा और उसके पुत्र वीरमदेव अलाउद्दीन खिलजी के साथ जालौर दुर्ग में युध्द करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए तथा 1311-1312ई.के लगभग खिलजी ने जालौर पर अधिकार किया । इस युध्द का वर्णन कवि पद्मनाभ द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ ' कान्हङदे प्रबंध ' तथा ' वीरमदेव सोनगरा री बात ' मे किया गया हैं। जालौर दुर्ग अपनी.सुदृढता के कारण संकटकाल मे जहाॅ मारवाङ के राजाओ का आश्रय स्थल रहा वही इसमे राजकीय कोष भी रखा जाता रहा ।संत मल्लिक शाह की दरगाह तथा दुर्ग मे स्थित परमार कालीन कीर्ति स्तम्भ जैन धर्मावलम्बियो की आस्था का केन्द्र प्रसिद्ध ' स्वर्णगिरी ' मंदिर ,तोपखाना आदि जालौर दुर्ग के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल हैं।

जाने जयपुर के गुलाल गोठे के बारेमें

वैसे नाम से तो लगता है कि गुलाल गोठा कोई मिठाई का नाम हैं ।पर यह मिठाई है नही ।तो फिर है क्या और इसका क्या प्रयोग होता हैं और कैसे बनता है जाने आज की इस पोस्ट में गुलाल गोठा, लाख को गरम करके उसे फुला कर गेंद का आकार देकर उसमे गुलाल भर कर बनाया जाता हैं।पुराने समय मे जयपुर के राजा महाराजा अपनी जनता के साथ होली खेलने के लिए इसका प्रयोग करते थे।राजा जनता पर इस गुलाल गोठे को फेकते जिससे इसके अन्दर का गुलाल बाहर निकल कर जनता पर लग जाता ।इस प्रकार जनता राजा के साथ होली खेल कर बडी प्रसन्न होती थी । गुलाल गोठे कि खासियत यह है कि इससे किसी पर फेकने पर बिना चोट लगे यह फुट जाता हैं और इसके अन्दर का गुलाल बाहर निकल जाता हैं।समय के साथ इसका प्रयोग घटता जा रहा हैं पर आज भी होली के समय जयपुर कि विशेष पहचान बना हुआ हैं।जयपुर मे मनिहारो कि गली मे मुस्लिम समुदाय के लोगो के द्वारा इसे बनाया जाता हैं और यह उनकी रोजी रोटी का एक जरिया हैं।

(SpecialEconomic Zones-SEZ in Rajasthan)-राजस्थान में विशेष आर्थिक क्षेत्र

राजस्थान की दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से पश्चिमी तट के बंदरगाहों से समीपता इस राज्य को निर्यात-उन्मुख औद्योगिक विकास के लिए एक आदर्श स्थान बनाते हैं। प्रस्तावित दिल्ली-मुंबई फ्रेट कॉरिडोर का 40% भाग राजस्थान से गुजरता है जो यहाँ इस कॉरिडोर में विशेष आर्थिक क्षेत्र के रूप में औद्योगिक बेल्ट के विकास के लिए भारी संभावनाएं उत्पन्न करता है। सरकार का मुख्य उद्देश्य राज्य में निर्यात को बढ़ावा देने के लिए बुनियादी ढांचा निर्मित करने तथा उद्योगों के लिए परेशानी मुक्त वातावरण प्रदान करने में सक्षम बनाने हेतु विशेष रूप से चिह्नित आर्थिक क्षेत्र विकसित करने का है।सरकार द्वारा रत्न एवं आभूषण, हस्तशिल्प, ऊनी कालीन आदि क्षेत्रों में राज्य की अंतर्निहित क्षमता का दोहन करने के लिए ''उत्पाद विशिष्ट विशेष आर्थिक क्षेत्रों'' के विकास पर विशेष जोर दिया गया है। 165.15 अरब के निवेश की उम्मीद के साथ छह विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) को पहले से ही अधिसूचित किया जा चुका है जो निम्नांकित हैं- 1. महिंद्रा वर्ल्ड सिटी (जयपुर) लिमिटेड, जयपुर 2. सोमानी वर्स्टेड लिमिटेड, खुशखेडा, भिवाड़ी

Rajasthan's Lok Devta and Lok Devi (लोक देवता एंव लोक देवियां) GK

Rajasthan's Lok Devta and Lok Devi (लोक देवता एंव लोक देवियां) 1. चौबीस बाणियां किस लोकदेवता से संवंधित पुस्तक/ ग्रन्थ है ? Ans: रामदेवजी 2. संत जसनाथजी का जन्म किस जिले में हुआ था (RAS 94,99) Ans: बीकानेर 3. भूरिया बाबा किसके आराध्य देवता है ? (RPSC 2nd GR 2010) Ans: मीणा 4. राजस्थान में भक्ति आन्दोलन के प्रणेता थे ? Ans: संत दादू 5. जाम्भो जी के अनुयायी कहलाते है (RPSC 2nd GR 2010, RAS 03) Ans: विश्नोई 6. लोक संत पीपाजी का विशाल मेला कंहाँ लगता है Ans: समदङी ग्राम में (बाङमेर) 7. किस संत के चमत्कारों से प्रसन्न होकर सिकंदर लोदी ने उन्हें जागीर प्रदान की ?(Patwari Hanumangarh 2011) Ans: जसनाथजी 8. भूमि के रक्षक देवता के रूप में किसे पूजा जाता है ? Ans: भौमिया जी 9. कबीर पंथी समुदाय का प्रमुख ग्रंथ है ? (B.ED. -03 ) Ans: कबीर वाणी 10. बल्लभ सम्प्रदाय का प्रमुख धार्मिक स्थल है ? (RAS -89 , 92 ) Ans: नाथद्वारा 11. लोक देवता गोगाजी का प्रसिध्द मेला कंहाँ लगता है Ans: गोगामेङी, हनुमानगढ 12. तेजाजी का प्रमुख तीर्थ स्थान है ? (RPSC 2nd GR 2010) Ans: परबतसर

Rajasthan's leading animal development and reproduction center-राजस्थान के प्रमुख पशु विकास एवं प्रजनन केंद्र

1. भैंस प्रजनन केंद्र - वल्लभनगर (उदयपुर) 2. चारा बीज उत्पादन फार्म - मोहनगढ़ (जैसलमेर) 3. बतख, चूजा उत्पादन केंद्र - बांसवाड़ा 4. राष्ट्रीय पोषाहार संस्थान - जामडोली (जयपुर) 5. बकरी प्रजनन फार्म - रामसर (अजमेर) 6. षुकर प्रजनन फार्म - अलवर 7. बूलमदर फार्म - चादन गांव (जैसलमेर) 8. केंद्रीय पषु प्रजनन केद्र - सूरतगढ़ (गंगानगर) 9. राज्य कुंकुट फार्म - जयपुर 10. गौवंष संवर्द्धन फार्म - बस्सी (जयपुर) 11. राष्ट्री उष्ट्र अनुसंधान केंद्र - जोहड़बीड़ (बीकानेर) 12. पष्चिमी क्षेत्रीय बकरी अनुसंधान केंद्र - अविका नगर (टोंक) 13. केंन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधन संस्थान - अविकानगर (टोंक) 14. नाली नस्ल भेड़ प्रजनन अनुसंधान  केंद्र  - हनुमानगढ़ 15. मगरा पुगल भेड़ प्रजनन अनुसंधान  केंद्र  - बीकानेर 16. राजस्थान भेड़ व ऊन प्रषिक्षण केद्र - जोधपुर 17. राजस्थान ऊन विष्लेषण प्रयोगषाला - बीकानेर 18. मुर्रा नस्ल भेड़ प्रजनन केंद्र - कुमेर (भरतपुर)

Introduction to Rajasthan-राजस्थान -एक परिचय

राजस्थान -एक परिचय राजस्थान हमारे देश का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य हैं, जो हमारे देश के उत्तर-पश्चिम मे स्थित है। यह भू-भाग प्रागैतिहासिक काल से लेकर आज तक कई मानव सभ्यताओ के विकास एवं पतन की स्थली रहा है। यहाँ पूरा-पाषाण युग, कांस्य युगीन सिंधु सभ्यता की प्राचीन बस्तियाँ, वैदिक सभ्यता एवं ताम्रयुगीन सभ्यताएँ खूब फली फूली थी। छठी शताब्दी के बाद राजस्थानी भू-भाग मे राजपुत राज्यो का उदय प्रारम्भ हुआ। जो धीरे धीरे सम्पूर्ण क्षेत्र मे अलग-अलग रियासतो के रूपमे विस्तृत हो गयी। ये रियासते राजपूत राजाओ के अधीन थी। राजपूत राजाओ की प्रधानता के कारण कालांतर मे इस सम्पूर्ण क्षेत्र को 'राजपूताना' कहा जाने लगा। वाल्मीकि ने राजस्थान प्रदेश को 'मरुकांतार' कहा है। राजस्थान शब्द का प्राचीनतम प्रयोग 'राजस्थानीयादित्य' वी.स. 682 मे उत्कीर्ण वसंतगढ़ (सिरोही) के शिलालेख मे उपलब्ध हुआ है। उसके बाद मुहणौत नैन्सी के ख्यात व रजरूपक में राजस्थान शब्द का प्रयोग हुआ है। परंतु इस भू-भाग के लिए राजपूताना शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1800 ई. मे जॉर्ज थॉमस द्वारा किया गया था। कर्नल

Forest Estate of Rajasthan - Types of Forests-राजस्थान की वन सम्पदा- वनों के प्रकार

वन-सरंक्षण की दिशा मेंप्रयास- राजस्थान में वन संरक्षण के लिए एकीकृत वन विभाग की स्थापना 1951 में की गई, तब राजस्थान के सभी वनों को नियमित वैज्ञानिक प्रबंध के अंतर्गत लिया गया और वनों की सीमा का सीमांकन किया गया। लगभगसभी वन-क्षेत्रों या फारेस्ट-ब्लॉक्स को राजस्थान वन अधिनियम 1953 के अंतर्गत अधिसूचित किया गया । सन 1960 में जमीदारी उन्मूलन के साथ जागीर एवं जमीन वन राजस्थान वन विभाग के नियंत्रण मेंआ गए। जंगलों का वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए सभी वन प्रभागों के पास नियमित रूपसे कार्ययोजना है। राज्य के शुष्क परिस्थितियों तथा मरुस्थलीकरण को कम करने के लिए व्यापक वनीकरण योजनाओं रूप मेंअच्छी तरह से लागू की गई। राज्य के वनों की सामान्य विशेषताएं- राजस्थान का क्षेत्रफल नॉर्वे (3, 24,200 वर्गकिमी), पोलैंड (3, 12,600 वर्ग किमी) और इटली (3, 01,200 वर्गकिमी) जैसे कुछ पश्चिमी दुनिया के विकसित देशों के लगभगबराबर है। राजस्थान में वनों का कुल क्षेत्रफल 32,638.74 वर्ग किलोमीटर है जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 9.54% है। राजस्थान में वनक्षेत्र उत्तरी , दक्षिणी ,पूर्वी औरदक्षिण-पूर्वी भागों मेंअसम

Desert camel-रेगिस्थान का जहाज ऊँट

दूर तक फैला रेत का समंदर। इस रेत के समंदर में मनुष्य का हर क़दम पर साथ देता रेगिस्तान के जहाज के नाम से मशहूर ऊंट। विश्व में एक कूबड़ और दो कूबड़ वाले ऊंट पाये जाते हैं। भारत में ज़्यादातर एक कूबड़ वाले ऊंट ही देखने को मिलते हैं। हालांकि ऊंट को भी दूसरे जानवरों की तरह नियमित रूप से भोजन और पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन इसकी विशेषता यह होती है कि यह 21 दिन तक बिना पानी पिये चल सकता है। इसकी पीठ पर जो कूबड़ होता है वह चर्बी का भंडार होता है। इसमें जमा चर्बी को यह ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल कर लेता है। रेगिस्तान में ऊंट मनुष्य के सुख-दु:ख का सहभागी बनकर उसके सभी कार्यों, जैसे परिवहन, खेती, सेना की गश्त, दूध, गोश्त की पूर्ति करता है। राजस्थान की संस्कृति में यह गहरे तक प्रवेश किये हुए है। भारत में लगभग 75 प्रतिशत आबादी सिर्फ राजस्थान में है। अपना मार्ग याद रखने की क्षमता, 15 किमी. प्रति घंटे से लेकर 65 किमी. प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकता है। बीकानेर में ऊंट मेला लगता है और यहां पर ऊंट अनुसंधान केंद्र भी खुला है। आज ऊंटनी के दूध की उत्पादन क्षमता लगभग 1500 लाख लीटर है। ऊंटनी के दूध क

High Places of Rajasthan-राजस्थान के प्रमुख दर्शनीय स्थल

1. हवामहल – जयपुर 2. जंतर मंतर – जयपुर 3. गलता जी – जयपुर 4. आमेर किला – आमेर, जयपुर 5. बिड़ला तारामंडल – जयपुर 6. सरगासूली (ईसर लाट) – जयपुर (RPSC Exam) 7. गेटोर की छतरियां – जयपुर 8. नाहरगढ़ – जयपुर 9. गोविन्दजी का मंदिर – जयपुर 10. मुबारक महल – जयपुर (RPSC Exam) 11. आभानेरी मंदिर – दौसा 12. सोनीजी की नसियाँ – अजमेर 13. ढाई दिन का झोंपड़ा – अजमेर 14. दौलत बाग – अजमेर 15. अकबर का किला – अजमेर 16. दरगाह शरीफ् – अजमेर 17. ब्रह्मा मंदिर – पुष्कर 18. नव ग्रह मंदिर – किशन गढ़ 19. सास-बहू के मंदिर ( प्राचीन नागदा के मंदिर) – कैलाशपुरी, उदयपुर 20. सहेलियों की बाड़ी – उदयपुर 21. सज्जनगढ़ – उदयपुर 22. आहड़ संग्रहालय – उदयपुर 23. जगत के प्राचीन मंदिर – जगत गाँव उदयपुर 24. कुम्भा श्याम मंदिर – उदयपुर 25. द्वारकाधीश मंदिर – कांकरोली राजसमंद 26. कुंभलगढ़ – केलवाड़ा राजसमंद 27. श्रीनाथजी मंदिर – नाथद्वारा, राजसमंद 28. विजय स्तम्भ – चित्तौड़ 29. कीर्ति स्तम्भ – चित्तौड़ 30. रानी पद्मनी महल – चित्तौड़गढ़ 31. सांवलिया जी मंदिर – मंडफिया, चित्तौड़गढ़ 32. विनय निवास महल

Lok Devata kalla ji rathod-लोक देवता कल्ला जी राठौड़

लोक देवता कल्ला जी राठौड़ का जन्म विक्रम संवत 1601 में दुर्गाष्टमी को नागौर जिले के मेड़ता शहर में हुआ था। वे मेड़ता रियासत के राव जयमल राठौड़ के छोटे भाई आस सिंह के पुत्र थे। भक्त कवयित्री मीराबाई इनकी बुआ थी। इनका बाल्यकाल मेड़ता में ही व्यतीत हुआ लेकिन बाद में वे चित्तौड़ दुर्ग में आ गए। वे अपनी कुल देवी नागणेचीजी माता के भक्त थे। कल्ला जी प्रसिद्ध योगी संत भैरव नाथ के शिष्य थे। माता नागणेची की भक्ति के साथ साथ वे योगाभ्यास भी करते थे। कल्लाजी ने औषधि विज्ञान की शिक्षा भी प्राप्त की थी। ये चार हाथों वाले देवता के रूप में प्रसिद्ध है। इनकी मूर्ति के चार हाथ होते हैं। इनकी वीरता की कथा बड़ी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि सन 1568 में अकबर की सेना ने चितौड़ पर कब्जा करने के लिए किले को घेर लिया। लम्बे समय तक सेना जब दुर्ग को घेरे रही तो किले के अंदर की सारी रसद समाप्त हो गई। तब सेनापति जयमल राठौड़ ने केसरिया बाना पहन कर शाका करने तथा क्षत्राणियों ने जौहर करने का निश्चय किया। फिर क्या था, किले का दरवाजा खोल कर चितौड़ की सेना मुगलों पर टूट पड़ी। युद्ध में सेनापति जयमल राठौड़ पैरों में घाव होने से घ

इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा

इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बाईसा रा बीरा लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा सुसराजी तो दिल्ली रा राजवी सा म्हारा सासूजी तो गढ़ रा मालक सा इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा जेठजी तो घर रा पाटवी सा म्हारा जेठानी तो घर रा मालक सा इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारो देवरियो तो तारा बिचलो चंदो सा महरी द्योरानी तो आभा माय्ली बीजळी सा इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा सायब्जी तो दिल रा राजवी सा म्हें तो सायब्जी रे मनडे री राणी सा इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लह

Jain Temple of Rajasthan-राजस्थान के प्रमुख जैन मंदिर

1. दिगम्बर जैन तीर्थ श्रीमहावीरजी- जैन धर्मावलंबियों की आस्था का प्रमुख केंद्र यह मंदिर करौली जिला मुख्यालय से 29 किमी दूर श्री महावीरजी नामक स्थान पर स्थित है। यह मंदिर संपूर्ण भारत के जैन धर्म के पवित्र स्थानों मेंसे एक है। गंभीर नदी के तट पर स्थित इस मंदिर में जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी की प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर प्राचीन व आधुनिक जैन वास्तुकला का अनुपम संगम है। यह मंदिर मूल रूपसे सफेद व लाल पत्थरों से बना है तथा इसमें चारों ओर छत्रियाँ बनी हुई हैं। इस विशालकाय मंदिर के ऊँचे धवल शिखर को स्वर्ण कलशों से सजाया गया है। इसमें अन्य जैन तीर्थंकरों की भव्य मूर्तियाँ भी प्रतिष्ठित हैं। मंदिर की दीवारों पर की गई स्वर्ण पच्चीकारी इसके स्वरूप को अत्यंत कलात्मक स्वरूपप्रदान करती है। मंदिर के सामने सफेद संगमरमर से बने ऊँचा भव्य मानस स्तंभ में महावीर की मूर्ति है। कहा जाता है कि भगवान महावीर की यह प्रतिमा यहाँ खुदाई मेँ एक व्यक्ति को प्राप्त हुई थी। प्रतिमा के उद्भव स्थल पर चरण चिह्न एक सुंदर छत्री मेँप्रतिष्ठित हैं।छत्री के सम्मुख ही प्रांगण में 29 फुट ऊँचा महावीर स्तूप निर्

आबूरोड के पास सियावा का आदिवासी गणगौर मेला , मेले की अनोखी 'खीचना' की परम्परा

             आबूरोड के पास सियावा का गणगौर मेला , मेले की  अनोखी  'खीचना' की परम्परा  भले ही आदिवासी समाज शिक्षा व विकास के अन्य पैमानों पर पिछड़ा हुआ हो ,लेकिन समाज के बीच एक परम्परा इसे अलग ही पहचान देती है |जो अन्य लोगों के लिए आज भी असम्भव सी और विस्मित कर देने वाली सी लगती है |इस समाज में यह परम्परा युवक युवतियो को उनकी पसंद से जीवनसाथी चुने जाने की आजादी देती है |दोनों एक दूसरे को  पसंद कर ले और फिर दोनों आपस में सहमत हो तो विवाह कर ले |यदि दोनों को लगे की उनके परिजन इसके लिए तैयार नहीं होंगे तो दोनों अपना गाँव छोड़कर दूसरे गाँव में रहने लगते हैं |अपना जीवन बिताते है और फिर एक दिन ऐसा भी आता है जब दोनों का विवाह कर सामाजिक स्वीकृति दे दी  जाती है|यह सारी परम्पराए निभाई जाती है समाज के सियावा मेले में| ...........तो बच्चे करवाते है शादी  कई बार ऐसा भी होता है की लम्बे समय तक दोनों को परिजनों की सहमति नहीं मिलती|दोनों के बच्चे हो जाते हैं ,वे बड़े होते है |परम्परानुसार वे भी मेले में अपना जीवनसाथी चुनते है और फिर उन दोनों के विवाह में माता पिता का विवाह भी होता है |

World famous sword of Sirohi-विश्व विख्यात सिरोही की तलवार

सिरोही की तलवार को पहचान दिलाने वाले परिवार में सबसे बुजुर्ग प्यारेलाल के हाथों में आज भी वह हुनर मौजूद है जो पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हें मिलता रहा और जिसकी बदौलत सिरोहीं की तलवार को देश दुनिया में पहचान मिली | 62 वर्षीय प्यारेलाल कई सालों से तलवारें बना रहे है , लेकिन फिर भी जब भी मौका मिलता है वे तलवार को ढालने लगते है |आज भी लोहे पर ऐसी सटीक चोट करते है की तलवार की धार वैसी ही जैसी कई सालों पहले रहा करती थी |लोग आज भी उन्हें ढूंढते हुए उस गली तक आ पहुचते हैं जहाँ प्यारेलाल तलवार बनाने का काम  करते हैं |पिता की ढलती उम्र और साथ छोड़ते स्वास्थ्य के कारण अहमदाबाद में रहने वाले बेटे ने भी कई बार कहा की आप मेरे साथ चलिए ,लेकिन वे नहीं माने|कहा की जब तक हिम्मत है ये तलवारे बनाता रहूँगा |गौरतलब है की प्यारेलाल इतिहास  की स्वर्णिम पन्नों में दर्ज सिरोही की प्रसिद्ध तलवारे में माहिर परिवार के आखिरी शिल्पकार है |जो रियासत काल से ही तलवार बनाते आ रहे हैं | इस खासियत की वजह से मिली प्रसिधी   सिरोही तलवार की यह खासियत है की आज के मशीनी युग में भी लोहे को गर्म करके सिर्फ हथौड़े की सहायता से तैय

Famous Shaktipeeth Tanotaray Mata Jaisalmer-प्रसिद्ध शक्तिपीठ तनोटराय माता जैसलमेर

भारत पाकिस्तान सीमा पर स्थित माता "तनोटराय" का मन्दिर अत्यंत प्रसिद्ध है। यह मंदिर जैसलमेर जिला मुख्यालय से करीब 120 किलोमीटर दूर एवं भारत पाक अंतर्राष्ट्रीय सीमा से 20 किलोमीटर अंदर की और स्थित है। तनोट माता जैसलमेर के भाटी शासकों की कुलदेवी मानी जाती है। कहा जाता है कि जैसलमेर का तनोट नामक स्थान भाटी राजाओं की राजधानी हुआ करता था। भाटी शासक मातेश्वरी श्री तनोट राय के भक्त थे। यह भी कहा जाता है कि उनके आमंत्रण पर महामाया सातों बहने तणोट पधारी थी , इसी कारण भक्ति भाव से प्रेरित होकर राजा ने इस मन्दिर की स्थापना की थी। यह माता भारत-पाकिस्तान के मध्य 1965 तथा 1971 के युद्ध के दौरान सीमा क्षेत्र की रक्षा करने वाली तनोट माता के मन्दिर के रूप में प्रसिद्ध है। तनोट माता के प्रति आम भक्तों के साथ-साथ सैनिकों में भी अतीव आस्था है। माता के मन्दिर की देखरेख, सेवा, पूजापाठ, आराधना व अर्चना सीमा सुरक्षा बल के जवान ही करते हैं। तनोट माता के बारे में विख्यात है कि 1971 में हुए भारत पाकिस्तान के युद्ध के दौरान सैकड़ों बम मंदिर परिसर में पाकिस्तान की सेना द्वारा गिराए गए थे किंतु माता क

राजस्थान सामान्य ज्ञान आभूषण क्विज (भाग-2) ( Rajasthan GK jewelry Quiz)

1. सटका शरीर के किस अंग का आभूषण है? अ. गला ब. कमर स. नाक द. पैर उत्तर- ब 2. कंदौरा शरीर के किस अंग पर पहना जाता है? अ. सिर ब. कमर स. उँगली द. पैर उत्तर- ब 3. निम्नांकित में से सिर पर पहने जाने वाला आभूषण है- अ. बोर या बोरला ब. नथ स. बिछिया द. टड्डा उत्तर- अ 4. रखड़ी आभूषण किस अंग का है? अ. कमर ब. सिर स. हाथ द. गला उत्तर- ब 5. निम्नांकित में से पैर में पहने जाने वाले आभूषण हैं- अ. हंसली, सूरलिया, बाली ब. करधनी, कड़ा, बंगड़ी स. टनका, हिरना, पैंजनी द. मोली, सूरमा, बंगड़ी उत्तर- स 6. निम्नांकित में से पुरुषों द्वारा पहने जाने वाला आभूषण है- अ. बोरला ब. मुरकिया स. बंगड़ी द. टड्डा उत्तर- ब 7. पंचलड़ी, हंसुली, हाली व तिणणिया किस अंग पर पहने जाते हैं- अ. सिर ब. गला स. कमर द. बाजू उत्तर- ब 8. राजस्थान का मशहूर लोकगीत गोरबंद किस पशु के गले में पहने जाने वाले आभूषण से संबंधित है? अ. घोड़ा ब. बैल स. ऊँट द. बकरी उत्तर- स 9. गले में बाँधी जाने वाली देवी देवताओं की प्रतिमा को कहते हैं- अ. नावा ब. चौकी स. उपर्युक्त दोनों द. इनमें से कोई नहीं उत्तर- स 1

Jewelery in the life style of women in Rajasthan-राजस्थान में महिलाओं की जीवन-शैली में आभूषण

राजस्थान में महिलाओं की जीवन-शैली में आभूषण एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है। यूं तो राजस्थानी आभूषण महिलाओं की प्रतिदिन की साज-सज्जा का अंग है, किन्तु ये उनकी वर्तमान स्थिति (वैवाहिक स्थिति) को भी अभिव्यक्त करती है। राजस्थान में महिलाओं के सर से पाँव तक पारंपरिक आभूषण से सजने में उनकी वैवाहिक स्थिति का कड़ाई से पालन किया जाता है। राजस्थान की महिलाएं सिर ले कर पाँव तक स्वयं को सज्जित करती है। राजस्थान में ललाट के आभूषणों की एक दीर्घ परंपरा है। इनमें से एक आभूषण बोर है। बोर को स्त्रियाँ अपनी ललाट के ठीक मध्य में पहनती है, या सर-माँग के रूप में केवल बालों के विभाजन के स्थान में पहना जाता है, अथवा यह एक माथा-पट्टी की तरह एक सिर-बंधन (हेड-बैंड) के रूप में हो सकता है। बोर या रखड़ी जिसे घुंडी या बोरला भी कहा जाता है, केश-रेखा पर ललाट के मध्य स्थल पर भूषित किया जाता है। इसे सोने या चांदी का बनाया जाता है तथा इसकी आकृति सामान्यतः गोलाकार होती है यद्यपि यह कभी-कभी समतल-शीर्ष आकार का भी रखा जाता है। इसकी सतह पर विभिन्न प्रकार की डिजाइन को आमतौर पर ग्रैन्युलेशन (दाने बनाने की प्रक्रिया) के माध्य