Skip to main content

Posts

Showing posts from September, 2019

लोक देवता पाबूजी राठौड़ का जीवन परिचय(LOKDEVTA PABU JI RATHORE)

लोक देवता पाबूजी राठौड़ का जीवन परिचय(LOKDEVTA PABU JI RATHORE) !! सूरवीर गौ रक्षक वीर श्री पाबूजी राठौड़  !! सोढी छोड़ी बिल्खती , माथै सावण मौड़ । अमला वैला आपने ,रंग है पाबुजी राठौड़।। ●  राव सिहाजी "मारवाड में राठौड वंश के संस्थापक " उनके तीन पुत्र थे । राव आस्थानजी, राव अजेसीजी, राव सोनगजी ! ●  राव आस्थानजी के आठ पूत्र थे ! राव धुहडजी, राव धांधलजी, राव हरकडजी,राव पोहडजी, राव खिंपसिजी, राव आंचलजी,राव चाचिंगजी, राव जोपसाजी ! ●  राव धांधलजी राठौड़ के दो पुत्र थे ! बुढोजी और पाबुजी ! ●  श्री पाबूजी राठौङ का जन्म 1313 ई में कोळू ग्राम में हुआ था ! कोळू ग्राम जोधपुर में फ़लौदी के पास है । धांधलजी कोळू ग्राम के राजा थे, धांधल जी की ख्याति व नेक नामी दूर दूर तक प्रसिद्ध थी । ●  एक दिन सुबह सवेरे धांधलजी अपने तालाब पर नहाकर भगवान सूर्य को जल तर्पण कर रहे थे । तभी वहां पर एक बहुत ही सुन्दर अप्सरा जमीन पर उतरी ! राजा धांधल जी उसे देख कर उस पर मोहित हो गये, उन्होने अप्सरा के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा । ●  जवाब में अप्सरा ने एक वचन मांगा कि राजन ! आप जब भी मेरे कक्ष में प्रवेश करोगे तो स

लोकदेवता पनराज जी भाटी का जीवन परिचय(LOKDEVTA PANRAJ JI )

लोकदेवता पनराज जी भाटी का जीवन परिचय(LOKDEVTA PANRAJ JI ) एक ऐसा वीर क्षत्रिय ..........जिसका एक स्मारक जैसलमेर में हैं तो दूसरा #पाकिस्तान के बहावलपुर में ....... #ब्राह्मणों_की_गायों_के_लिए_बारह_कोस_बिना_सिर_के_लड़ने_वाला_वीर #पनराज जी की कहानी श्री पनराज जी भाटी का जीवन परिचय ---- राजा विजयराज लांझा (जिनको "उत्तर भड़ किवाड़" की पदवी मिली थी ) के द्वितीय पुत्र राहड़जी (रावल भोजदेव के छोटे भाई), राहड़जी के भूपतजी, भूपतजी के अरड़कजी, अरड़कजी के कांगणजी व कांगणजी के पुत्र के रूप में व माता देवकंवर की कोख से वीर पनराज का जन्म 13वीं सदी के अंतिम चरण में हुआ | श्री पनराज जी जैसलमेर महारावल घड़सी जी के समकालीन थे तथा वे उनके प्रमुख सलाहकार भी थे, क्षत्रियोचित संस्कारो से अलंकृत पनराज जी बचपन से ही होनहार व विशिष्ट शोर्य व पराक्रम की प्रतिमुर्ति थे, श्री पनराजजी ने घड़सीजी सन 1378 ईस्वी में बंगाल अभियान में भाग लेकर गजनी बुखारे के बादशाह के इक्के की मल्लयुद्ध में उसकी भुजा उखाड़कर उसे पराजित कर अपने अद्भुत शोर्य का परिचय दिया, जिससे प्रसन्न होकर बादशाह ने घड़सी जी को "गजनी का ज