• कठपुतली चित्र

    राजस्थानी कठपुतली नृत्य कला प्रदर्शन

Monday, June 21, 2021

राजस्थान साहित्य अकादमी(Rajasthan Sahitya Akademi)

राजस्थान साहित्य अकादमी(Rajasthan Sahitya Akademi)

राजस्थान साहित्य अकादमी की स्थापना 28 जनवरी, 1958 को राज्य सरकार द्वारा एक शासकीय इकाई के रूप में की गई और 08 नवम्बर, 1962 को स्वायतता प्रदान की गई, तदुपरान्त यह संस्थान अपने संविधान के अनुसार राजस्थान में साहित्य की प्रोन्नति तथा साहित्यिक संचेतना के प्रचार-प्रसार के लिए सतत सक्रिय है।

राजस्थान साहित्य अकादमी की स्थापना साहित्य जगत् हेतु एक सुखद और महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। साथ ही राजस्थानके सांस्कृतिक और साहित्यिक पुनर्निर्माण एवं विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।



उद्देश्य

  • राजस्थान में हिन्दी साहित्य की अभिवृद्धि के लिए  प्रयत्न करना।
  • राजस्थान के हिन्दी भाषा के साहित्यकारों और विद्वानों में पारस्परिक सहयोग की अभिवृद्धि के लिए प्रयत्न करना।
  • संस्थाओं और व्यक्तियों को हिन्दी साहित्य से संबंधित उच्च स्तरीय ग्रन्थों, पत्र-पत्रिकाओं, कोश ,विश्वकोष, आधारभूत शब्दावली, ग्रन्थ निर्देशिका, सर्वेक्षण व सूचीकरण आदि के सृजन व प्रकाशन में सहायता देना तथा स्वयं भी इनके प्रकाशन की व्यवस्था करना।
  • भारतीय भाषाओं में एवं विश्वभाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य का अनुवाद करना तथा ऐसे अनुवाद कार्य को प्रोत्साहित करना या सहयोग देना।
  • साहित्यिक सम्मेलन, विचार-संगोष्ठियों, परिसंवादों, सृजनतीर्थ, रचना पाठ, लेखक शिविर, प्रदर्शनियां, अन्तर प्रादेशिक साहित्यकार बंधुत्व यात्राएं, भाषणमाला, कवि सम्मेलन एवं हिन्दी साहित्य के प्रचार-प्रसार की अन्य योजनाओं आदि की व्यवस्था करना तथा तद्निमित्त आर्थिक सहयोग देना।
  • राजस्थान के साहित्यकारों को उनकी हिन्दी साहित्य की उत्कृष्ट रचनाओं के लिए सम्मानित करना।
  • हिन्दी साहित्य से संबंधित सृजन, अनुवाद, साहित्यिक शोध व आलोचनापरक अध्ययन संबंधी प्रकल्प, भाषा वैज्ञानिक एवं साहित्यिक सर्वेक्षण, लोक साहित्य संग्रह तथा ऐसे ही प्रकल्पों के लिए राजस्थान की संस्थाओं तथा व्यक्तियों को वित्तीय सहयोग देना तथा स्वयं भी ऐसे प्रकल्पों को निष्पन्न करना।
  • राजस्थान के हिन्दी के साहित्यकारों को वित्तीय सहायता, शोधवृत्तियां आदि देना।
  • अकादमी पुस्तकालय, वाचनालय तथा अध्ययन एवं विचार-विमर्श केन्द्र स्थापित करना और इस प्रवृत्ति के विकास के लिए राजस्थान की हिन्दी संस्थाओं को वित्तीय सहयोग देना।
  • ऐसे अन्य कार्य करना जो अकादमी के उद्देश्यों को आगे बढाने के लिए आवश्यक समझे जावें चाहे वे उपरोक्त कृत्यों में हो या न हों

संगठन :

  •  सरस्वती सभा (सर्वोच्च सभा)
  • संचालिका (कार्यकारिणी)
  • वित्त समिति
  • परामर्शदात्री समितियां

 

सम्मान  एवं पुरस्कार योजना -

 

  • सम्मान परम्परा - प्रदेश के वरिष्ठ और मूर्धन्य साहित्यकारों को अकादमी उनके समग्र कृतित्व एवं व्यक्तित्व के आधार पर चार प्रकार से सम्मानित करती है - ‘साहित्य मनीषी’, ‘जनार्दनराय नागर सम्मान’, ‘विशिष्ट साहित्यकार सम्मान और ‘अमृत सम्मान’। ‘साहित्य मनीषी’ सम्मान प्रति तीन वर्ष की कालावधि में राज्य के एक श्रेष्ठ साहित्यकार को प्रदान किया जाता है जिसमें सम्मान स्वरूप 2.51 लाख रु., प्रशस्ति पत्र आदि भेंट किये जाने का प्रावधान है। ‘जनार्दनराय नागर सम्मान’ सम्मान 1.00 लाख रु. का है। ‘विशिष्ट साहित्यकार सम्मान’ में 51 हजार रु., प्रशस्ति पत्र आदि भेंट किये जाते हैं। ‘अमृत सम्मान’ में 31 हजार रु. प्रशस्ति पत्र आदि भेंट किये जाते हैं। 
  • पुरस्कार योजना - अकादमी प्रति वर्ष विज्ञप्ति प्रसारित कर श्रेष्ठ कृतियों को पुरस्कृत करती है। अकादमी द्वारा वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ-साथ,  विद्यालयों में अध्ययनरत विधार्थियों को पुरस्कृत करने की योजनाएं हैं। अकादमी का सर्वोच्च ‘मीरा पुरस्कार’ 75 हजार रु. है। इसके अलावा अकादमी प्रतिवर्ष   - ‘सुधीन्द्र’(कविता), ‘रांगेय राघव’(कहानी-उपन्यास), ‘देवीलाल सामर’(नाटक) , ‘देवराज उपाध्याय’ (आलोचना), ‘कन्हैयालाल सहल’(विविध विधाएं), ‘सुमनेश जोशी’(प्रथम प्रकाशित कृति),  ‘श्ांभूदयाल सक्सेना’(बाल साहित्य) के साथ महाविद्यालय और विद्यालय स्तरीय  डॉ. सुधा गुप्ता, चन्द्रदेव शर्मा और परदेशी पुरस्कार की प्रविष्टियां आमंत्रित कर प्रदान करती है। 

 

प्रवृत्तियां -

  • मधुमती पत्रिका - अकादमी की मधुमती मासिक पत्रिका हिन्दी-साहित्य की चर्चित और उल्लेखनीय पत्रिका है। गत् 53 वर्षों से यह पत्रिका प्रकाशित हो रही है। मधुमती पत्रिका ने गत् 58 वर्षों  में राजस्थान की भाषा-साहित्य और संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाया है। मधुमती पत्रिका के माध्यम से राज्य में नवोदित साहित्यकारों को प्रोत्साहित और उन्हें अवसर देने का पूरा कार्य किया गया है।
  • कृतिकार प्रस्तुति योजना - अकादमी ने राजस्थान के स्थापित प्रबुद्ध साहित्यकारों के कृतित्व व उनके साहित्यिक योगदान को सामान्यजन तक पहुंचाने का विनम्र प्रयास ‘कृतिकार प्रस्तुति’ (मोनोग्राफ) प्रकाशन योजना के माध्यम से किया है। इस योजना के अन्तर्गत चुनिंदा रचनाकारों के व्यक्तित्व व कृतित्व पर केन्द्रित विशिष्ट सामग्री प्रकाशित की जाती है।  
  • पुस्तक प्रकाशन सहयोग योजना - अकादमी की प्रमुख प्रवृत्ति श्रेष्ठ व साहित्यिक ग्रंथों का प्रकाशन करना है। इस योजना के अन्तर्गत अकादमी राजस्थान के सृजनशील लेखकों की पुस्तकों, संकलनों, ग्रंथावलियों आदि का प्रकाशन करती है। अकादमी अपने रचनाकारों को पुस्तक प्रकाशन पर यथानियम रायल्टी या मानदेय भी देती हैं। हमारे पुरोधा - इस योजना में दिवंगत पुरोधा साहित्यकारों के व्यक्तित्व व कृतित्व पर हमारे पुरोधा ग्रंथों का प्रकाशन किया गया है।
  • साहित्यिक समारोह -  अकादमी राजस्थान में यथानिर्णय विभिन्न प्रकार के साहित्यिक समारोह प्रतिवर्ष विभिन्न अंचलों में आयोजित करती है। इन समारोहों में लेखक सम्मेलन, साहित्यकार सम्मान समारोह, आंचलिक साहित्यकार समारोह, सेमीनार, कवि गोष्ठियां, लेखक शिविर, अन्तरप्रान्तीय बंधुत्व यात्रा, साहित्यकार सृजन साक्षात्कार, पाठक मंच और साहित्य के सामाजिक सरोकार आदि विषयों पर मूर्धन्य व पुरोधा साहित्यकारों की स्मृति में व्याख्यानमालाएं आदि।
  • पाठक मंच - पाठकों में साहित्यिक कृतियों के प्रति अभिरुचि उत्पन्न करने और एक साहित्यिक वातावरण निर्मित करने के लिए अकादमी ने राजस्थान में विभिन्न स्थानों पर पाठक मंचों की स्थापना की है। इन पाठक मंचों के माध्यम से साहित्यिक कृतियों पर खुली चर्चा तथा बहस की शुरुआत की गयी है। राज्य के विभिन्न जिलों स्थित केन्द्रों पर संचालित इस योजना का व्यापक प्रभाव व स्वागत हुआ है।
  • अध्ययन विचार-विमर्श केन्द्र - यह योजना राजस्थान में अद्यतन अग्रांकित स्थानों पर संचालित है - श्रीडूंगरगढ़, बीकानेर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, भरतपुर। इन केन्द्रों में अकादमी द्वारा पाठकों को अकादमी प्रकाशन व पत्रिका आदि निःशुल्क अध्ययनार्थ उपलब्ध हैं।

 

साहित्यकारों को आर्थिक सहयोग -

  • चिकित्सा व अभावग्रस्त सहयोग - अकादमी द्वरा प्रतिवर्ष रुग्ण साहित्यकारों को चिकित्सा एवं अभावग्रस्त योजना में चिकित्सा सहयोग दिया जाता है। साथ ही अभावग्रस्त साहित्यकारों को भी अिर्थक सहयोग प्रदान किया जाता है।  
  • सक्रिय, संरक्षित सम्मान सहयोग - अकादमी प्रतिवर्ष सक्रिय, संरक्षित सम्मान सहयोग योजना में राजस्थान के वरिष्ठ और सक्रिय साहित्यकारों को सम्मान सहयोग राशि लेखन को प्रोत्साहित करने हेतु प्रदान करती है।  
  • पाण्डुलिपि प्रकाशन सहयोग योजना - अकादमी की ‘पांडुलिपि प्रकाशन सहयोग’ योजनान्तर्गत राज्य के नवोदित लेखकों से पांडुलिपियों पर सहयोग दिया जाता है। सत्र 82-83 से प्रारंभ की गई इस योजना में अब तक अकादमी के सहयोग से अद्यतन 606 पांडुलिपियां प्रकाशित हुई हैं।  
  • प्रकाशित ग्रंथों पर सहयोग -  इस योजनान्तर्गत लेखकों व लेखन को प्रोत्साहित करने हेतु अकादमी  प्रकाशित पुस्तकों पर आर्थिक सहयोग प्रदान करती है।
  • साहित्यिक संस्थाओं को सहयोग - अकादमी से इस समय राजस्थान स्थित 8 संस्थाएं सम्बद्ध और 13 मान्यता प्राप्त संस्थाएं हैं, जो सम्पूर्ण राजस्थान में निरन्तर साहित्यिक प्रसारात्मक कार्यों में संलग्न हैं। 
  • वृहद शोध संदर्भ केन्द्र - शोधार्थियों, आमजन हेतु अकादमी भवन में ही एक शोध संदर्भ, पुस्तकालय-वाचनालय का संचालन किया जा रहा है। इस पुस्तकालय में शोधपरक हिन्दी भाषा और साहित्य की 28,299 महत्वपूर्ण शोध ग्रंथ उपलब्ध हैं। वाचनालय में अध्ययनार्थ आने वाले पाठकों के लिए 79 साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक व त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं तथा 13 दैनिक पत्र उपलब्ध हैं।
  • ध्वनि-चित्र संकलन - लब्ध प्रतिष्ठ व वरिष्ठ साहित्यकारों की वाणी को संरक्षित रखने की दृष्टि से यह योजना प्रारंभ की गई है। इस योजना में अद्यतन राजस्थान के 53 रचनाकारों की रचनाएं उन्हीं की वाणी में संग्रहीत हैं। 
  • एकात्म सभागार - माननीय मुख्यमंत्री, राजस्थान की घोषणा के अन्तर्गत अकदमी में एकात्म सभागार का निर्माण किया गया है। उक्त सभागार में 200 व्यक्तियों के बैठकों की सुविधा है और इस सभागार ए.सी. की सुविधा उपलब्धहै । उक्त सभागार की लागत 230.58 लाख रु. है।  
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मीरा अकादमिक पुरस्कार ( Meera Academic Award)

मींरा पुरस्कार

1डॉ. रामानंद तिवारीभारतीय संस्कृति के प्रतीक(नि.)1959-60
2डॉ. रामानंद तिवारीअभिनव रस मीमांसा (आ.)1962-63
3श्री रघुवीर मित्रभूमिजा (का.)1963-64
4श्री पोद्दार रामावतार‘अरुण’बाणाम्बरी (का.)1963-64
5डॉ. वेंकट शर्माकाव्य सर्जना और काव्यास्वाद (आ.)1974-75
6डॉ. दयाकृष्ण विजयआंजनेय (का.)1978-79
7डॉ. पानू खोलियासत्तर पार के शिखर (उप.)1979-80
8श्री हमीदुल्लाउत्तर उर्वशी (ना.)1980-81
9श्री यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’हजार घोड़ों का सवार (उप.)1982-83
10श्री नंद चतुर्वेदीशब्द संसार की यायावरी (आ.)1983-84
11श्री विजेन्द्रचैत की लाल टहनी (का.)1986-87
12श्री नंदकिशोर आचार्यवह एक समुद्र था (का.)1986-87
13श्री हरीश भादानीएक अकेला सूरज खेले (का.)1986-87
14श्री ऋतुराजनहीं प्रबोध चन्द्रोदय (का.)1987-88
15श्री ईश्वर चन्दरलौटता हुआ अतीत (कथा.)1988-89
16डॉ. विश्वंभरनाथ उपाध्यायजोगी मत जा (उप.)1990-91
17श्री अन्नाराम सुदामाआंगन नदिया (उप.)1991-92
18डॉ. कन्हैयालाल शर्मापूर्वी राजस्थानी उद्भव और विकास (आलो.)1992-93
19डॉ. राजेन्द्रमोहन भटनागरप्रेम दीवानी (उप.)1994-95
20श्री भगवान अटलानीअपनी-अपनी मरीचिका (उप.)1995-96
21श्रीमती सावित्री परमारजमी हुई झील (कथा)1997-98
22डॉ. चंद्रप्रकाश देवलबोलो माधवी (काव्य)1998-99
23डॉ. जीवनसिंहकविता और कविकर्म (आलो.)2000-01
24डॉ. जबरनाथ पुरोहितरेंगती हैं चिटियां (काव्य)2001-02
25श्री हरिराम मीणाहां, चांद मेरा है (काव्य)2002-03
26श्री बलवीर सिंह ‘करुण’मैं द्रोणाचार्य बोलता हूं (महाकाव्य)2005-06
27श्री आनंद शर्माअमृत पुत्र (उप.)2007-08
28श्रीमती मृदुला बिहारीकुछ अनकही (उप.)2008-09
29डॉ. जयप्रकाश पण्ड्या ‘ज्योतिपुंज‘बोलो मनु! बोलते क्यों नहीं?2010-11
30श्री अम्बिका दत्तआवों में बारहों मास2011-12
31श्री भवानी सिंहमांणस तथा अन्य कहानियां2012-13
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मीरा बाई पेनोरमा ,मेड़ता,नागौर(MEERA BAI PENORAMA,MEDTA,NAGOUR)

मीरा बाई पेनोरमा ,मेड़ता,नागौर

95.36 लाख रूपये की वित्तीय स्वीकृति से पेनोरमा का निर्माण पूर्ण किया जा चुका है।आमजन के दर्शनार्थ चालू है।

मीरा बाई के जीवन का संक्षिप्त परिचय

श्री कृष्ण की अनन्य भक्त मीरा बाई श्री कृष्ण की भक्ति करते-करते अन्ततः श्री कृष्ण की प्रतिमा में विलीन हो गयी।राव दूदाजी ने पन्द्रहवीं शताब्दी में दूदागढ़, मेड़ता सिटी में भव्य गढ़ का कलाकृति से निर्माण कराया, जो एक लोक आकर्षक धरोहर ‘गढ़’ भवन के रूप में प्रसिद्ध है।

मीरा बाई मेड़ता के राठौड़ वंष के शासक राव रतनसिंह की पुत्री थी। मीरा का जन्म 1498 ई. में ‘कुड़की’ गांव (मेड़ता) में हुआ था। इसका लालन-पालन इनके दादा दूदाजी ने किया। इनका बाल्यकाल वैष्णव धर्म से ओत-प्रोत था। मीरा में कृष्ण के प्रति भक्ति का बीजारोपण बचपन से ही हो गया था। इनकी भक्ति भावना ‘माधुर्य’ भाव की थी। मीरा नारी संतों में ईष्वर प्राप्ति की साधना में लगे रहने वाले भक्तों में प्रमुख थी।

1516 ई. में मीरा का विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ। भोजराज की आकस्मिक मृत्यु के उपरान्त मीरा का सांसारिक जीवन में लगाव कम हो गया और उसकी निष्ठा भक्ति व संत सेवा की ओर बढ़ने लगी। मीरा को जब ये ज्ञात हुआ कि उसके नटवरनागर-कृष्ण तो बहुत पहले ही वृन्दावन त्याग कर द्वारिका जा बसे हैं तो उसी समय वह उनसे मिलने द्वारिका चल दी। 

भक्ति काल में मीरा के समकक्ष अन्य कोई नारी भक्त नहीं थी। मीरा के पदों में सांसारिक बन्धनों से मुक्ति पाकर ईष्वर की भक्ति में पूर्ण समर्पण की भावना दृष्टिगत होती है। मीरा का धर्म अपने आराध्य की हृदय से भक्ति करना था।

मीरा के मुख्य ग्रंथ- ‘‘सत्यभाभा जी नू रूसणो’’, ‘‘गीत गोविन्द की टीका’’, ‘‘राग गोविन्द’’, ‘‘मीरा री गरीबी’’, ‘‘रूकमणी मंगल’’, आदि माने गये हैं। उन के भजनों में जीव, दया और अहिंसा को विषेष महत्व दिया गया है। देषकाल व वातावरण के अनुसार मीरा के पदों में भाषा का प्रभाव देखने को मिलता है।

आज भी ‘‘मीरादासी सम्प्रदाय’’ अनेक भक्तों द्वारा अपनाया जाता है जो भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धान्तों का पोषक है। आज भी मीरा के भजन जन-जन के कण्ठों से मुखरित होते सुनाई पड़ते हैं।

श्री कृष्ण की अनन्य भक्त मीरा बाई एवं उनकी भक्ति को प्रदर्षित करने हेतु राजस्थान सरकार द्वारा वर्ष 2008 में 95.36 लाख रूपये से राव दूदागढ़, मेड़ता का संरक्षण कर उसमें मीरा बाई पेनोरमा का निर्माण किया गया है। इस पेनोरमा में सिलिकाॅन फाइबर से निर्मित मूर्तियां, रिलिफ पेनल, मिनिएचर, षिलालेख आदि के माध्यम से मीरा बाई के जीवन के प्रेरणादायी प्रसंगों एवं महत्वपूर्ण घटनाक्रमों को आम जनता के अवलोकनार्थ प्रस्तुत किया गया है। 

राजस्थान सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के अधीन कार्यरत राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण द्वारा मीरा बाई पेनोरमा, मेड़तासिटी का विकास एवं विस्तार का कार्य द्वितीय चरण में वर्ष 2014 से किया जा रहा है।

वर्ष 2015 में मीरा बाई पेनोरमा, मेड़तासिटी का 1,60,262 तथा वर्ष 2016 में 1,50,076 पर्यटकों ने टिकिट लेकर अवलोकन किया। वर्ष 2008 से वर्ष 2016 तक कुल 10,28,852 पर्यटकों ने राव दूदागढ़, मेड़ता स्थित इस पेनोरमा का अवलोकन किया है। राव दूदागढ़ कृष्णभक्तों के लिए एक तीर्थस्थल की भांति लोकप्रिय हो गया है।

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Sunday, June 20, 2021

राजस्थान में बकरियों की प्रमुख नस्लें

राजस्थान में बकरियों की प्रमुख नस्लें :

 
राजस्थान में मुख्य रूप से सिरोही मारवाड़ी जखराना एवं जमनापारी नस्ल की बकरियाँ पायी जाती हैं।

सिरोही:
यह नस्ल राजस्थान में अरावली पर्वतमालाओं के आसपास के क्षेत्रों में तथा सिरोही, अजमेर, नागौर, टोंक, राजसमंद एवं उदयपुर जिलों में मुख्य रूप से पायी जाती हैं। इस नस्ल में रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं सूखा सहन करने की क्षमता अन्य बकरियों की अपेक्षा अधिक होती है। इस नस्ल के पशु का आकार मध्यम एवं शरीर गठीला होता है। यह नस्ल मुख्यतः मांस एवं दूध के लिए पाली जाती है। इसके शरीर का रंग हल्का एवं गहरा भूरा व शरीर पर काले, सफेद एवं गहरे काले रंग के धब्बे होते हैं। कुछ पशुओं में गले के नीचे अंगुली जैसी दो गूलरे (मांसल भाग) एवं मुँह के जबड़े के नीचे की तरफ दाढ़ीनुमा बाल पाये जाते हैं। कान चपटे, नीचे की तरफ लटके हुए, लम्बे एवं पत्तीनुमा होते हैं तथा पूंछ छोटी एवं ऊपर की तरफ मुड़ी हुई होती है। प्रजनन योग्य नर का औसत शरीर भार 40-50 किलो व मादा का शरीर भार 30-35 किलो होता है। इनका दुग्ध उत्पादन 100 किग्रा. ( 115 दिनों में) होता है। इस नस्ल की बकरिया प्रायः एक साथ 2 बच्चों को जन्म देती हैं।


मारवाड़ी :
यह नस्ल राजस्थान में जोधपुर, पाली, नागौर, बीकानेर, जालौर, जैसलमेर व बाड़मेर जिलों में पायी जाती हैं। यह मध्यम आकार की काले रंग की बकरी है। इसका शरीर लम्बे बालों से ढका होता है। कान चपटे व मध्यम आकार के व नीचे की ओर लटके होते हैं। नर का औसत शरीर भार 30-35 किलो व मादा का शरीर भार 25-30 किलो होता है। इनके शरीर से वर्ष में औसतन 200 ग्राम बालों की प्राप्ति होती है जो गलीचे / नमदा आदि बनाने के काम आते हैं। इनका दुग्ध उत्पादन 95 किग्रा. ( 115 )दिनों में होता है।

जखराना :
यह नस्ल राजस्थान के अलवर जिले एवं आस पास के क्षेत्रों में पायी जाती हैं। यह आकार में बड़ी तथा काले रंग की होती है। इनके मुँह व कानों पर सफेद रंग के धब्बे पाये जाते हैं। इनका दुग्ध उत्पादन 120 किग्रा. (115 दिनों में) होता है तथा वर्ष भर में इनका औसत शारीरिक भार 20 किलो तक पहुंच जाता है। इनके व्यस्क नर का भार औसतन 55 कि.ग्रा. तक होता है।

जमनापारी:
यह नस्ल मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के चकरनगर व गढ़पुरा इलाके में बहुतायत से पायी जाती हैं। यह क्षेत्र यमुना व चम्बल नदियों के कछार में स्थित है। ये बकरियाँ, बीहड़ व खादर क्षेत्रों में जहाँ पर चराई की अच्छी सुविधा उपलब्ध हो तो खूब पनपती है। वर्तमान समय में इनकी मूल नस्ल की संख्या 6 हजार से भी कम है। इस कारण इनका त्वरित संवर्धन परम आवश्यक है। यह एक बड़े आकार की बकरी है। इसका रंग सफेद होता है और कभी-कभी गले व सिर पर धब्बे भी पाये जाते हैं। इनकी नाक उभरी हुई होती जिसे रोमन नोज कहते है। इस पर बालों के गुच्छे होते हैं। रोमन नोज एवं जांघों के पिछले भाग में सफेद बाल इस नस्ल की मुख्य पहचान है। इनके कान काफी बड़े व लटके हुए होते हैं। नर व मादा दोनों में ही प्रायः सींग पाये जाते हैं। इनके वयस्क नर एवं मादा का शारीरिक भार क्रमशः 44 एवं 38 कि.ग्रा. होता है। इनकी लम्बाई व ऊँचाई क्रमशः 77 / 75 एवं 78 / 75 सेंमी. होती है। यह भी एक दुकाजी नस्ल है परन्तु इससे दूध उत्पादन सबसे अधिक प्राप्त किया जाता है। ये बकरियाँ 194 दिनों के दुग्धकाल में 200 कि.ग्रा. औसतन दुग्ध देती है। वर्ष भर में इन बकरियों का शारीरिक भार 21-26 कि.ग्रा. तक हो जाता है। इसे नस्ल सुधार कार्यक्रमों में भी प्रयोग किया जाता है।

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अमर सागर जैन मंदिर जैसलमेर (Amar Sagar Jain Temple Jaisalmer)

अमर सागर जैन मंदिर जैसलमेर (Amar Sagar Jain Temple Jaisalmer)

लोद्रवा के रास्ते केवल 6 किलोमीटर पर स्थित यह जगह महाराजा अमर सिहं ने एक जलाशय के रूप में 1688 में विकसित की थी। यह एक प्राकृतिक स्थान है । यहां के बांध बारिश का पानी रोकने के लिये बनवाये गये थे । अनेक पृष्ठभाग तैयार किये गये जिन पर गर्मी के दिनों के लिये महल मन्दिर तथा बगीचे विकसित किये गये। 

तालाब के दक्षिण में बड़ा ही खूबसूरत जैन मन्दिर है, जिसका निर्माण जैसलमेर के पटवा सेठ हिम्मत मल बाफना ने 1871 में बनवाया था ।
बाफना समाज के इतिहास कुछ इस तरह से बताया जाता है। परमार राजा पृथ्वीपाल के वशंज राजा जोबनपाल और राजकुमार सच्चीपाल ने कई युद्ध जीते जिसका श्रेय उन्होंने 'बहुफणा पार्श्वनाथ शत्रुंजय महा मन्त्र' के लगातार उच्चारण को दिया।युद्ध जीतने के बाद उन्होंने जैन आचार्य दत्तसुरी जी से जैन धर्म की दीक्षा ली।उसके बाद से वे बहुफणा कहलाने लगे।

 कालान्तर में बहुफणा, बहुफना, बाफना या बापना में बदल गया। बाफना समाज की कुलदेवी ओसियां की सच्चीय माता हैं। इसीलिए इनके मंदिरों में जैन तीर्थंकर के अतिरिक्त हिन्दू मूर्तियाँ भी स्थापित की जाती हैं।


मंदिर में ज्यादातर जैसलमेर का पीला पत्थर इस्तेमाल किया गया है। पर साथ ही सफ़ेद संगमरमर और हल्का गुलाबी जोधपुरी पत्थर भी कहीं कहीं इस्तेमाल किया गया है।मंदिर के स्तम्भ, झऱोखे और छतों पर कमाल की नक्काशी है।



जैसलमेर से मंदिर तक आने जाने के लिए आसानी से वाहन मिल जाते हैं।प्रवेश के लिए  शुल्क है और कैमरा शुल्क देकर फोटो भी ली जा सकती हैं. मंदिर सुबह से शाम तक खुला रहता है।

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श्री गंगाजलिया (श्री गंगेश्वर) महादेव मंदिर, गांव काछोली आबूराज (shri Gangajaliya Mandir kachholi Aburaj)

श्री गंगाजलिया (श्री गंगेश्वर) महादेव मंदिर, गांव काछोली आबूराज (shri Gangajaliya Mandir kachholi Aburaj)

श्री गंगाजलिया महादेव मंदिर या श्री गंगेश्वर महादेव जी का अतिप्राचीन मंदिर साधु-संतों, साधकों, सिद्धो, तपस्वियों, योगियों, मुनियों और महात्माओं का पसंदीदा तपस्थली रहा है क्योंकि यहाँ साक्षात गंगा मैया महादेव जी का वंदन करती है। यहां अनेक संतों ने भजन किया है ।

कई संतों की यहां समाधियां है। श्री गेनाराम जी महाराज, श्री जोगाराम जी महाराज आदि संतों की यहां समाधी है। भजन के लिए सर्वथा उपर्युक्त आबूराज का श्री गंगाजलिया महादेव मंदिर श्री मुनि जी महाराज, श्री हनुमान दास जी महाराज ,श्री गैनजी महाराज ,श्री जोगाराम जी महाराज आदि संतो की साधना स्थली रही है ।

श्री गंगाजलिया या श्री गंगेश्वर महादेव मंदिर आदि अनादि है। अणगोर गुप्तेश्वर महादेव मंदिर के महंत श्री महादेव गिरी जी ने बताया कि यहां अनेक अलोप साधुओं का वास है और वे दिन-रात आत्म कल्याण और जगत कल्याण के लिए यहां भजन करते हैं।

जब इस मंदिर में काछोली गांव से निकलते हैं तो हरे भरे क्षेत्र और कई बरसाती नालों को पार करते हुए इस मंदिर में पहुंचते है । इस मंदिर के आसपास झरनों और बरसाती नालों से यह क्षेत्र बेहद रमणीक है। यहां जहां भक्तों का आना-जाना रहता है वहीं पर्यटन की दृष्टि से भी यह स्थान पर्यटकों का आकर्षण का केंद्र है। अनेक प्रकृति प्रेमी लोग यहां घूमने की दृष्टि से भी आते हैं ।

आबु के महान संत श्री गेन जी महाराज ने आज से 50 साल पहले अपना नश्वर शरीर काछोली गांव में शाम को 5:00 बजे छोड़ा लेकिन यहां उन्होंने भजन किया था इसलिए यहां इनकी समाधि है । संत श्री जोगाराम जी महाराज की समाधि है और काछोली गांव की श्री गजरा माई जो श्री गेन जी महाराज की अनन्य भक्त थी या उनकी कृपा पात्र थी जिन्होंने लंबे समय तक साधना की उनकी भी यहां प्रतिमा है।

यहां गुफा के अंदर अतिप्राचीन और चमत्कारी स्वयंभू शिवलिंग है है । बड़ी बड़ी शिलाओं के बीच में यहां कई प्राकृतिक जलकुंड हैं जिनमें पानी कभी नहीं सूखता ।श्री गंगाजलिया महादेव मंदिर आबू राज का वो तीर्थ है जहां पहुंचने मात्र से मन को शांति मिलती है। श्री गंगाजलिया महादेव मंदिर पहुंचने के लिए स्वरूपगंज से वाया काछोली होते हुए इस मंदिर में पहुंचते हैं ।

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श्री मार्कंडेश्वर महादेव एवं मां सरस्वती का अतिप्राचीन मंदिर अजारीधाम जिला सिरोही राजस्थान(AJARI DHAM)

श्री मार्कंडेश्वर महादेव  एवं  मां  सरस्वती का अतिप्राचीन मंदिर अजारीधाम जिला सिरोही राजस्थान(AJARI DHAM)


सिरोही जिले के पिंडवाड़ा तहसील में शहर की भागदौड़ से दूर शांत और एकांत स्थान में श्री मार्कंडेश्वर महादेव का अतिप्राचीन मंदिर स्थित है। सिरोही से लगभग 28 किलोमीटर दूर पिंडवाड़ा के नजदीक अजारी गाँव के बाहर प्रकृति की गोद मे ये मंदिर बना हुआ है ।यहां श्री मार्कुडेश्वर महादेव जी के पास में मां सरस्वती का मंदिर है । 

मां वीणापाणि का यह वह तीर्थ है जो अतिप्राचीन और बहुत चमत्कारी है, जहाँ ऋषि मार्कंडेय जी ने तप किया था । श्री मार्कंडेश्वर महादेव मंदिर के पास प्राचीन कुंड, गुरु गोरक्षनाथ जी का धूणा, मां काली और श्री भैरवनाथ जी का भी मंदिर भी है। यह स्थान आबू के महान संत योगीराज श्री महादेव नाथ जी की तपस्थली भी है ।


यहां का संपूर्ण नजारा प्राकृतिक और सुरम्य है, आसपास की हरियाली और बड़े-बड़े खजूर के पेड और पशु पक्षियों की भरमार यहां की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं ।


यहां गुरु गोरखनाथ जी का धूणा, श्री भैरव नाथ जी का और मां काली का मंदिर, कुंड और महादेव का मंदिर सब कुछ जीवंत है इस स्थान पर महादेव नाथ जी ने वर्षों तक तप साधना की थी, उनसे पहले भी कई नाथ योगी यहाँ आए और वर्तमान में उनके शिष्य पूज्य संत श्री रेवानाथ जी महाराज इस योगाश्रम के महंत है ।


वैसे तो आमतौर पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है लेकिन बसंत पंचमी, महाशिवरात्रि, गुरुपूनम आदि अवसरों पर यहां मेला लग जाता है।

महशूर टीवी कलाकार तारक मेहता का उल्टा चश्मा में तारक मेहता का किरदार निभाने वाले शैलेश लौढा यहाँ दर्शन करने आते  रहते है।
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