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Showing posts from April, 2015

Jain Temple of Rajasthan-राजस्थान के प्रमुख जैन मंदिर

1. दिगम्बर जैन तीर्थ श्रीमहावीरजी- जैन धर्मावलंबियों की आस्था का प्रमुख केंद्र यह मंदिर करौली जिला मुख्यालय से 29 किमी दूर श्री महावीरजी नामक स्थान पर स्थित है। यह मंदिर संपूर्ण भारत के जैन धर्म के पवित्र स्थानों मेंसे एक है। गंभीर नदी के तट पर स्थित इस मंदिर में जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी की प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर प्राचीन व आधुनिक जैन वास्तुकला का अनुपम संगम है। यह मंदिर मूल रूपसे सफेद व लाल पत्थरों से बना है तथा इसमें चारों ओर छत्रियाँ बनी हुई हैं। इस विशालकाय मंदिर के ऊँचे धवल शिखर को स्वर्ण कलशों से सजाया गया है। इसमें अन्य जैन तीर्थंकरों की भव्य मूर्तियाँ भी प्रतिष्ठित हैं। मंदिर की दीवारों पर की गई स्वर्ण पच्चीकारी इसके स्वरूप को अत्यंत कलात्मक स्वरूपप्रदान करती है। मंदिर के सामने सफेद संगमरमर से बने ऊँचा भव्य मानस स्तंभ में महावीर की मूर्ति है। कहा जाता है कि भगवान महावीर की यह प्रतिमा यहाँ खुदाई मेँ एक व्यक्ति को प्राप्त हुई थी। प्रतिमा के उद्भव स्थल पर चरण चिह्न एक सुंदर छत्री मेँप्रतिष्ठित हैं।छत्री के सम्मुख ही प्रांगण में 29 फुट ऊँचा महावीर स्तूप निर्

आबूरोड के पास सियावा का आदिवासी गणगौर मेला , मेले की अनोखी 'खीचना' की परम्परा

             आबूरोड के पास सियावा का गणगौर मेला , मेले की  अनोखी  'खीचना' की परम्परा  भले ही आदिवासी समाज शिक्षा व विकास के अन्य पैमानों पर पिछड़ा हुआ हो ,लेकिन समाज के बीच एक परम्परा इसे अलग ही पहचान देती है |जो अन्य लोगों के लिए आज भी असम्भव सी और विस्मित कर देने वाली सी लगती है |इस समाज में यह परम्परा युवक युवतियो को उनकी पसंद से जीवनसाथी चुने जाने की आजादी देती है |दोनों एक दूसरे को  पसंद कर ले और फिर दोनों आपस में सहमत हो तो विवाह कर ले |यदि दोनों को लगे की उनके परिजन इसके लिए तैयार नहीं होंगे तो दोनों अपना गाँव छोड़कर दूसरे गाँव में रहने लगते हैं |अपना जीवन बिताते है और फिर एक दिन ऐसा भी आता है जब दोनों का विवाह कर सामाजिक स्वीकृति दे दी  जाती है|यह सारी परम्पराए निभाई जाती है समाज के सियावा मेले में| ...........तो बच्चे करवाते है शादी  कई बार ऐसा भी होता है की लम्बे समय तक दोनों को परिजनों की सहमति नहीं मिलती|दोनों के बच्चे हो जाते हैं ,वे बड़े होते है |परम्परानुसार वे भी मेले में अपना जीवनसाथी चुनते है और फिर उन दोनों के विवाह में माता पिता का विवाह भी होता है |

World famous sword of Sirohi-विश्व विख्यात सिरोही की तलवार

सिरोही की तलवार को पहचान दिलाने वाले परिवार में सबसे बुजुर्ग प्यारेलाल के हाथों में आज भी वह हुनर मौजूद है जो पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हें मिलता रहा और जिसकी बदौलत सिरोहीं की तलवार को देश दुनिया में पहचान मिली | 62 वर्षीय प्यारेलाल कई सालों से तलवारें बना रहे है , लेकिन फिर भी जब भी मौका मिलता है वे तलवार को ढालने लगते है |आज भी लोहे पर ऐसी सटीक चोट करते है की तलवार की धार वैसी ही जैसी कई सालों पहले रहा करती थी |लोग आज भी उन्हें ढूंढते हुए उस गली तक आ पहुचते हैं जहाँ प्यारेलाल तलवार बनाने का काम  करते हैं |पिता की ढलती उम्र और साथ छोड़ते स्वास्थ्य के कारण अहमदाबाद में रहने वाले बेटे ने भी कई बार कहा की आप मेरे साथ चलिए ,लेकिन वे नहीं माने|कहा की जब तक हिम्मत है ये तलवारे बनाता रहूँगा |गौरतलब है की प्यारेलाल इतिहास  की स्वर्णिम पन्नों में दर्ज सिरोही की प्रसिद्ध तलवारे में माहिर परिवार के आखिरी शिल्पकार है |जो रियासत काल से ही तलवार बनाते आ रहे हैं | इस खासियत की वजह से मिली प्रसिधी   सिरोही तलवार की यह खासियत है की आज के मशीनी युग में भी लोहे को गर्म करके सिर्फ हथौड़े की सहायता से तैय

Famous Shaktipeeth Tanotaray Mata Jaisalmer-प्रसिद्ध शक्तिपीठ तनोटराय माता जैसलमेर

भारत पाकिस्तान सीमा पर स्थित माता "तनोटराय" का मन्दिर अत्यंत प्रसिद्ध है। यह मंदिर जैसलमेर जिला मुख्यालय से करीब 120 किलोमीटर दूर एवं भारत पाक अंतर्राष्ट्रीय सीमा से 20 किलोमीटर अंदर की और स्थित है। तनोट माता जैसलमेर के भाटी शासकों की कुलदेवी मानी जाती है। कहा जाता है कि जैसलमेर का तनोट नामक स्थान भाटी राजाओं की राजधानी हुआ करता था। भाटी शासक मातेश्वरी श्री तनोट राय के भक्त थे। यह भी कहा जाता है कि उनके आमंत्रण पर महामाया सातों बहने तणोट पधारी थी , इसी कारण भक्ति भाव से प्रेरित होकर राजा ने इस मन्दिर की स्थापना की थी। यह माता भारत-पाकिस्तान के मध्य 1965 तथा 1971 के युद्ध के दौरान सीमा क्षेत्र की रक्षा करने वाली तनोट माता के मन्दिर के रूप में प्रसिद्ध है। तनोट माता के प्रति आम भक्तों के साथ-साथ सैनिकों में भी अतीव आस्था है। माता के मन्दिर की देखरेख, सेवा, पूजापाठ, आराधना व अर्चना सीमा सुरक्षा बल के जवान ही करते हैं। तनोट माता के बारे में विख्यात है कि 1971 में हुए भारत पाकिस्तान के युद्ध के दौरान सैकड़ों बम मंदिर परिसर में पाकिस्तान की सेना द्वारा गिराए गए थे किंतु माता क

राजस्थान सामान्य ज्ञान आभूषण क्विज (भाग-2) ( Rajasthan GK jewelry Quiz)

1. सटका शरीर के किस अंग का आभूषण है? अ. गला ब. कमर स. नाक द. पैर उत्तर- ब 2. कंदौरा शरीर के किस अंग पर पहना जाता है? अ. सिर ब. कमर स. उँगली द. पैर उत्तर- ब 3. निम्नांकित में से सिर पर पहने जाने वाला आभूषण है- अ. बोर या बोरला ब. नथ स. बिछिया द. टड्डा उत्तर- अ 4. रखड़ी आभूषण किस अंग का है? अ. कमर ब. सिर स. हाथ द. गला उत्तर- ब 5. निम्नांकित में से पैर में पहने जाने वाले आभूषण हैं- अ. हंसली, सूरलिया, बाली ब. करधनी, कड़ा, बंगड़ी स. टनका, हिरना, पैंजनी द. मोली, सूरमा, बंगड़ी उत्तर- स 6. निम्नांकित में से पुरुषों द्वारा पहने जाने वाला आभूषण है- अ. बोरला ब. मुरकिया स. बंगड़ी द. टड्डा उत्तर- ब 7. पंचलड़ी, हंसुली, हाली व तिणणिया किस अंग पर पहने जाते हैं- अ. सिर ब. गला स. कमर द. बाजू उत्तर- ब 8. राजस्थान का मशहूर लोकगीत गोरबंद किस पशु के गले में पहने जाने वाले आभूषण से संबंधित है? अ. घोड़ा ब. बैल स. ऊँट द. बकरी उत्तर- स 9. गले में बाँधी जाने वाली देवी देवताओं की प्रतिमा को कहते हैं- अ. नावा ब. चौकी स. उपर्युक्त दोनों द. इनमें से कोई नहीं उत्तर- स 1

Jewelery in the life style of women in Rajasthan-राजस्थान में महिलाओं की जीवन-शैली में आभूषण

राजस्थान में महिलाओं की जीवन-शैली में आभूषण एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है। यूं तो राजस्थानी आभूषण महिलाओं की प्रतिदिन की साज-सज्जा का अंग है, किन्तु ये उनकी वर्तमान स्थिति (वैवाहिक स्थिति) को भी अभिव्यक्त करती है। राजस्थान में महिलाओं के सर से पाँव तक पारंपरिक आभूषण से सजने में उनकी वैवाहिक स्थिति का कड़ाई से पालन किया जाता है। राजस्थान की महिलाएं सिर ले कर पाँव तक स्वयं को सज्जित करती है। राजस्थान में ललाट के आभूषणों की एक दीर्घ परंपरा है। इनमें से एक आभूषण बोर है। बोर को स्त्रियाँ अपनी ललाट के ठीक मध्य में पहनती है, या सर-माँग के रूप में केवल बालों के विभाजन के स्थान में पहना जाता है, अथवा यह एक माथा-पट्टी की तरह एक सिर-बंधन (हेड-बैंड) के रूप में हो सकता है। बोर या रखड़ी जिसे घुंडी या बोरला भी कहा जाता है, केश-रेखा पर ललाट के मध्य स्थल पर भूषित किया जाता है। इसे सोने या चांदी का बनाया जाता है तथा इसकी आकृति सामान्यतः गोलाकार होती है यद्यपि यह कभी-कभी समतल-शीर्ष आकार का भी रखा जाता है। इसकी सतह पर विभिन्न प्रकार की डिजाइन को आमतौर पर ग्रैन्युलेशन (दाने बनाने की प्रक्रिया) के माध्य

Historical chhatries of Rajasthanराजस्‍थान की ऐतिहासिक छतरियाँ

राजस्‍थान की ऐतिहासिक छतरियाँ 1. अमरसिंह की छतरी - नागौर 2. सिसोदिया राणाओं की छतरियाँ - आहड़ , उदयपुर 3. राव बीका जी रायसिंह की छतरियाँ - देव कुंड , बीकानेर 4. हाड़ा राजाओं की छतरियाँ - सार बाग , कोटा 5. रैदास की छतरी - चित्तौड़गढ़ 6. गोपालसिंह की छतरी - करौली  7. 84 खंभों की छतरी - बूँदी 8. राजा बख्तावर सिंह की छतरी - अलवर 9. 32 खंभों की छतरी - रणथम्भौर 10. केसर बाग व क्षार बाग की छतरियाँ - बूँदी ( बूँदी राजवंश की ) 11. भाटी राजाओं की छतरियाँ - बड़ा बाग , जैसलमेर 12. राठौड़ राजाओं की छतरियाँ - मंडोर जोधपुर 13. मूसी महारानी की छतरी - अलवर 14. महाराणा प्रताप की छतरी ( 8 खंभोकी )- बाडोली ( उदयपुर ) 15. कच्छवाहा राजाओं की छतरियाँ - गेटोर ( नाहरगढ़ , जयपुर ) 16. राव जोधसिंह की छतरी - बदनौर 17. जयमल ( जैमल ) व कल्ला राठौड़ की छतरियाँ - चित्तौड़गढ़ बड़ा बाग़ जैसलमेर

राजस्थानी लोक गीत घूमर एवं चम चम चमके चुन्दडी- Rajasthani folk songs Ghumar and Chamchat Chakte Chundadi

राजस्थानी लोक गीत घूमर एवं चम चम चमके चुन्दडी- घूमर गीत ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घुमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घुमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने काजळ टिकी लादयो ऐ माँ घुमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घुमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने लाडूङो लादयो ऐ माँ घुमर रमवा म्हें जास्याँ . ओ राजरी घुमर रमवा म्हें जास्याँ . ओ म्हाने परदेशियाँ मत दीजो रे माँ घुमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घुमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने राठोडा रे घर भल दीजो ऐ माँ घुमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घुमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हाने राठोडा री बोली प्यारी लागे ऐ माँ घुमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घुमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हारी घुमर छे नखराळी ऐ माँ घुमर रमवा म्हें जास्याँ .. चम चम चमके चुन्दडी गीत चम चम चमके चुन्दडी बिण्जारा रे कोई थोडो सो म्हारे सामे झांक रे बिण्जारा रे चम चम चमके चुन्दडी बिण्जारा रे चम चम चमके चुन्दडी बिण्जारा रे कोई थोडो सो म्हारे सामे झांक रे बिण्जारा रे कोई थोडो सो म्हारे सामे झांक रे बिण्जारा रे म्हारी तो रंग दे चुन्दडी बिण्जारा रे म्हारे साहेबा रो , म्हारे पिवजी रो , म्हा

राजस्थान विधानसभा के इतिहास में जुडा एक नया अध्याय

राजस्थान विधानसभा के इतिहास में रविवार 22मार्च 2015 को एक नया अध्याय जुड गया ।यह मौका रहा जब विधानसभा का संचालन रविवार को हुआ।संसदीय कार्य मंत्री राजेंद्र राठौङ ने सदन की कार्रवाई शुरू होते ही कहा कि जनप्रतिनिधियों को छुट्टी देकर आपदा प्रभावित किसानो से मिलने का अवसर दिया,यह भी पहला मौका था। रविवार को विधानसभा सत्र के संचालन से फर्क भले न पडे , लेकिन एक संदेश गया कि विधानसभा जनता के हितो को सर्वोपरी मानते हुए सबसे पहले उस  कार्य को करना जरूरी मानती हैं। राठौङ ने कहा कि इससे पहले भी एक वह दिन था जब 14अगस्त1972 को आजादी की रजत जयंती पर एक मिनट के लिए रात 11 बजे विधानसभा आहूत की गई थी।एक अवसर आया 31 मार्च 2010 को यही विधानसभा रात को तीन बजकर चालीस मिनट पर स्थगित हुई थी । उस समय पूरे प्रदेश में अकाल ,पेयजल व बिजली पर चर्चा चली थी।

तीर्थों का भांजा धौलपुर का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मचकुण्ड

मचकुंड धार्मिक स्थल मचकुण्ड अत्यंत ही सुन्दर व रमणीक धार्मिक स्थल है जो प्रकृति की गोद में राजस्थान के धौलपुर नगर के निकट स्थित है। यहां एक पर्वत है जिसे गन्धमादन पर्वत कहा जाता है। इसी पर्वत पर मुचुकुन्द नाम की एक गुफा है। इस गुफा के बाहर एक बड़ा कुण्ड है जो मचकुण्ड के नाम से प्रसिद्ध है। इस विशाल एवं गहरे जलकुण्ड के चारों ओर अनेक छोटे-छोटे मंदिर तथा पूजागृह पाल राजाओं के काल (775 ई. से 915 ई. तक) के बने हुए है। यहां प्रतिवर्ष ऋषि पंचमी तथा भादों की देवछट को बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसमें हजारों की संख्या में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। मचकुण्ड को सभी तीर्थों का भान्जा कहा जाता है। मचकुण्ड का उद्गम सूर्यवंशीय 24 वें "राजा मुचुकुन्द" द्वारा बताया जाता है। यहां ऐसी धारणा है कि इस कुण्ड में नहाने से पवित्र हो जाते हैं। यह भी माना जाता है कि मस्सों की बीमारी से त्रस्त व अन्य चर्म रोगों से परेशान लोग इस कुण्ड में स्नान करें तो वे इनसे छुटकारा पा जाते हैं। इसका वैज्ञानिक पक्ष यह है कि इस कुंड में बरसात के दिनों में जो पानी आकर इकट्ठा होता है उसमें गंधक व चर्म रोगों में

राजस्थान के प्रमुख अनुसंधान केन्द्रो के नाम

1. राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र - सेवर जिला भरतपुर 2. केन्द्रीय सूखा क्षेत्र अनुसंधान संस्थान - CAZRI- जोधपुर 3. केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान - अविकानगर जिला टौंक 4. केन्द्रीय ऊँट अनुसंधान संस्थान - जोहड़बीड़, बीकानेर 5. अखिल भारतीय खजूर अनुसंधान केन्द्र - बीकानेर 6. राष्ट्रीय मरुबागवानी अनुसंधान केन्द्र - बीकानेर 7. राष्ट्रीय घोड़ा अनुसंधान केन्द्र - बीकानेर 8. सौर वेधशाला - उदयपुर 9. राजस्थान कृषि विपणन अनुसंधान संस्थान - जयपुर 10. केन्द्रीय पशुधन प्रजनन फार्म - सूरतगढ़ जिला गंगानगर 11. राजस्थान राजस्व अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान - अजमेर 12. राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान - उदयपुर 13. सुदूर संवेदन केन्द्र - जोधपुर 14. माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं सर्वेक्षण संस्थान - उदयपुर 15. राष्ट्रीय मसाला बीज अनुसंधान केन्द्र - अजमेर 16. राष्ट्रीय आयुर्वेद शोध संस्थान - जयपुर 17. केन्द्रीय इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग शोध संस्थान (सीरी) - पिलानी 18. अरबी फारसी शोध संस्थान - टौंक 19. राजकीय शूकर फार्म - अलवर 20. केन्द्र

" पोमचा "- राजस्थान की एक प्रकार की ओढ़नी

"पोमचा" - राजस्थान की एक प्रकार की ओढ़नी राजस्थान में स्त्रियों की ओढ़नियों मे तीन प्रकार की रंगाई होती है- पोमचा, लहरिया और चूंदड़। पोमचा पद्म या कमल से संबद्ध है, अर्थात इसमें कमल के फूल बने होते हैं। यह एक प्रकार की ओढ़नी है।वस्तुतः पोमचा का अर्थ कमल के फूलके अभिप्राय से युक्त ओढ़नी है। यह मुख्यतः दो प्रकार से बनता है- 1. लाल गुलाबी 2. लाल पीला। इसकी जमीन पीली या गुलाबी हो सकती है।इन दोनो ही प्रकारों के पोमचो मेंचारो ओर का किनारा लाल होता है तथा इसमें लाल रंगसे ही गोल फूल बने होते हैं। यह बच्चे के जन्म के अवसर पर पीहर पक्ष की ओरसे बच्चे की मां को दिया जाता है।पुत्र का जन्म होने पर पीला पोमचा तथा पुत्री के जन्म पर लाल पोमचा देने का रिवाज है। पोमचा राजस्थान मेंलोकगीतों का भी विषय है।पुत्र के जन्म के अवसर पर "पीला पोमचा" का उल्लेख गीतों में आता है। एक गीत के बोल इस तरह है-                          "पोमचा" - राजस्थान की एक प्रकार की ओढ़नी " भाभी पाणीड़े गई रे तलाव में, भाभी सुवा तो पंखो बादळ झुकरया जी।      देवरभींजें तो भींजण दो ओदेवर और रंगावे म्हा