सोमवार, 27 अप्रैल 2015

Jain Temple of Rajasthan-राजस्थान के प्रमुख जैन मंदिर


1. दिगम्बर जैन तीर्थ श्रीमहावीरजी-
जैन धर्मावलंबियों की आस्था का प्रमुख केंद्र यह मंदिर करौली जिला मुख्यालय से 29 किमी दूर श्री महावीरजी नामक स्थान पर स्थित है। यह मंदिर संपूर्ण भारत के जैन धर्म के पवित्र स्थानों मेंसे एक है। गंभीर नदी के तट पर स्थित इस मंदिर में जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी की प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर प्राचीन व आधुनिक जैन वास्तुकला का अनुपम संगम है। यह मंदिर मूल रूपसे सफेद व लाल पत्थरों से बना है तथा इसमें चारों ओर छत्रियाँ बनी हुई हैं। इस विशालकाय मंदिर के ऊँचे धवल शिखर को स्वर्ण कलशों से सजाया गया है। इसमें अन्य जैन तीर्थंकरों की भव्य मूर्तियाँ भी प्रतिष्ठित हैं। मंदिर की दीवारों पर की गई स्वर्ण पच्चीकारी इसके स्वरूप को अत्यंत कलात्मक स्वरूपप्रदान करती है। मंदिर के सामने सफेद संगमरमर से बने ऊँचा भव्य मानस स्तंभ में महावीर की मूर्ति है। कहा जाता है कि भगवान महावीर की यह प्रतिमा यहाँ खुदाई मेँ एक व्यक्ति को प्राप्त हुई थी। प्रतिमा के उद्भव स्थल पर चरण चिह्न एक सुंदर छत्री मेँप्रतिष्ठित हैं।छत्री के सम्मुख ही प्रांगण में 29 फुट ऊँचा महावीर स्तूप निर्मित है।
2. जैन तीर्थ दिलवाड़ा (माउन्ट आबू)-
देश-विदेशों मेंविख्यात राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित ये मंदिर , पाँच मंदिरों का एक समूह है। इन मंदिरों का निर्माण ग्यारहवीं और तेरहवीं शताब्दी के मध्य हुआ था। जैन वास्तुकला के उत्कृष्ट प्रतीक ये शानदार मंदिर जैन धर्म के तीर्थंकरों को समर्पित हैं। दिलवाड़ा के मंदिरों में ' विमल वासाही मंदिर ' प्रथम तीर्थंकर को समर्पित है। यह सर्वाधिक प्राचीन है जो 1031 ई. में बना था। बाईसवें र्तीथकर नेमीनाथ को समर्पित 'लुन वासाही मंदिर ' भी काफी लोकप्रिय है। इसे 1231 ई.
में वास्तुपाल और तेजपाल नामक दो भाईयों द्वारा बनवाया गया था। दिलवाड़ा जैन मंदिर परिसर में स्थित पाँचों मंदिर संगमरमर से निर्मित हैं। मंदिरों में 48 स्तम्भों में नृत्यांगनाओं की आकर्षक आकृतियां बनी हुई हैं। दिलवाड़ा के पाँचों मंदिरोँ की विशेषता यह है कि उनकी छत, द्वार , तोरण , सभा-मंडप पर उत्कृष्ट शिल्प एक दूसरे से बिलकुल भिन्न है । संगमरमर के प्रत्येक पत्थर और खम्भे पर की गई उत्कृष्ट नक्काशी शिल्पकला की अनूठी मिसाल है, जिसे पर्यटक अपलक निहारता ही रह जाता है।
3. रणकपुर जैन तीर्थ -
पाली जिले में सादड़ी गाँव से 8 किमी दूरी पर स्थित रणकपुर जैन धर्म के पांच प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। यह स्थान चित्ताकर्षक रूपसे तराशे गए प्राचीन जैन मंदिरों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इनका निर्माण 15
वीं शताब्दी में राणा कुंभा के शासनकाल में हुआ था। ये जैन मंदिर भारतीय स्थापत्य कला एवं वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। इस मंदिर को "त्रेलोक्य दीपक" भी कहा जाता है। यहाँ का मुख्य मंदिर प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) का "चौमुख मंदिर" है जिसका निर्माण धन्ना शाह एवं रत्ना शाह द्वारा कराया गया। इसके निर्माण में शिल्पज्ञ देपाक सोमपुरा के निर्देशन में पचास से अधिक शिल्पियों ने कार्य किया था। यह मंदिर चारों दिशाओं में खुलता है। इसका निर्माण 1439 का माना जाता है। संगमरमर से निर्मित इस सुंदर मंदिर में 29 विशाल कक्ष तथा 14 स्तम्भ हैं।इस मंदिर के गलियारे में बने मंडपों में सभी 24 तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ हैं। सभी मंडपों में शिखर हैं औरशिखर के ऊपर घंटी लगी है। परिसर मेंही नेमीनाथ और पार्श्वनाथ के भी दो मंदिर हैं जिनकी नक्काशी खजुराहो की याद दिलाती है। यहाँ 8 वीं सदी में नागर शैली में निर्मित सूर्य मंदिर भी है जिसकी दीवारों पर योद्धाओं और घोड़ों के चित्र उकेरे गए हैं। रणकपुर के मंदिर 48 हजार वर्गफीट के घेरे में हैं जिनमें 24 मंडप, 85 शिखर व 1444स्तम्भ है।
4. दिगम्बर जैन तीर्थ केसरियाजी-
उदयपुर से लगभग 40 किमी दूर गाँव धूलेव मेंस्थित भगवान ऋषभदेव का यह मंदिर केसरिया जी या केसरिया नाथ के नाम से जाना जाता है। यह प्राचीन तीर्थ अरावली की कंदराओं के मध्य कोयल नदी के किनारे पर है। ऋषभदेव मंदिर को जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ माना जाता है। यह मंदिर न केवल जैन धर्मावलंबियों अपितु वैष्णव हिन्दूओं तथा मीणा और भील आदिवासियों एवं अन्य जातियों द्वारा भी पूजा जाता है। भगवान ऋषभदेव को तीर्थयात्रियों द्वारा अत्यधिक मात्रा में केसर चढ़ाए जाने के कारण उन्हें केसरियाजी कहा जाता है। यहाँ प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान आदिनाथ या ऋषभदेव की काले रंग की प्रतिमा स्थापित है। यहाँ के आदिवासियों के लिए ये केसरियाजी "कालिया बाबा" के नाम से प्रसिद्ध वपूजित है ।
5. नसियाँ जैन मंदिर अजमेर-
इस मंदिर को "लाल मंदिर" के नाम से प्रसिद्ध है । यह रणकपुर और माउंट आबू के पश्चात राजस्थान के उत्कृष्ट जैन मंदिरों में से एक है । नसियाँ मंदिर का निर्माण 1864 AD में प्रारंभ किया गया तथा यह 1895 AD में बन कर पूर्ण हुआ। यह मंदिर प्रथम जैन तीर्थँकर ऋषभदेव को समर्पित है। द्विमंजिल संरचना के इस मंदिर की दूसरी मंजिल पर एक बड़ा हॉल है जिसमें जैन धर्म व दर्शन को अभिव्यक्त करती हुई कृतियां उपलब्ध है। यहाँ इस मंदिर से संलग्न एक सुंदर म्यूजियम भी है ।इस मंदिर के प्रथम तल को ' स्वर्ण नगरी हॉल ' कहा जाता है । इसमें देश के प्रत्येक जैन मंदिर की सोने से बनाई गई प्रतीकृतियां सुसज्जित है । एक अनुमान है कि इनके निर्माण में तकरीबन 1000 kg सोना उपयोग में आया है ।
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