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    राजस्थानी कठपुतली नृत्य कला प्रदर्शन

Sunday, September 8, 2019

लोक देवता पाबूजी राठौड़ का जीवन परिचय(LOKDEVTA PABU JI RATHORE)-Rajasthan Gk

लोक देवता पाबूजी राठौड़ का जीवन परिचय(LOKDEVTA PABU JI RATHORE)

!! सूरवीर गौ रक्षक वीर श्री पाबूजी राठौड़  !!


सोढी छोड़ी बिल्खती , माथै सावण मौड़ ।
अमला वैला आपने ,रंग है पाबुजी राठौड़।।

● राव सिहाजी "मारवाड में राठौड वंश के संस्थापक " उनके तीन पुत्र थे ।
राव आस्थानजी, राव अजेसीजी, राव सोनगजी !

● राव आस्थानजी के आठ पूत्र थे !
राव धुहडजी, राव धांधलजी, राव हरकडजी,राव पोहडजी, राव खिंपसिजी, राव आंचलजी,राव चाचिंगजी, राव जोपसाजी !

● राव धांधलजी राठौड़ के दो पुत्र थे ! बुढोजी और पाबुजी !

● श्री पाबूजी राठौङ का जन्म 1313 ई में कोळू ग्राम में हुआ था ! कोळू ग्राम जोधपुर में फ़लौदी के पास है । धांधलजी कोळू ग्राम के राजा थे, धांधल जी की ख्याति व नेक नामी दूर दूर तक प्रसिद्ध थी ।

● एक दिन सुबह सवेरे धांधलजी अपने तालाब पर नहाकर भगवान सूर्य को जल तर्पण कर रहे थे । तभी वहां पर एक बहुत ही सुन्दर अप्सरा जमीन पर उतरी ! राजा धांधल जी उसे देख कर उस पर मोहित हो गये, उन्होने अप्सरा के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा ।
● जवाब में अप्सरा ने एक वचन मांगा कि राजन ! आप जब भी मेरे कक्ष में प्रवेश करोगे तो सुचना करके ही प्रवेश करोगे । जिस दिन आप वचन तोङेगें मै उसी दिन स्वर्ग लोक लौट जाउगीं, राजा ने वचन दे दिया । कुछ समय बाद धांधलजी के घर मे पाबूजी के रूप मे अप्सरा  मदुधौखा रानी के गर्भ से एक पुत्र का जन्म होता है । समय अच्छी तरह बीत रहा था, एक दिन भूल वश या कोतुहलवश धांधलजी अप्सरा रानी के कक्ष में बिना सूचित किये प्रवेश कर जाते है । वे देखते है कि अप्सरा रानी पाबूजी को सिंहनी के रूप मे दूध पिला रही है ।  राजा को आया देख अप्सरा अपने असली रूप मे आ जाती है और राजा धांधलजी से कहती है कि "हे राजन आपने अपने वचन को तोङ दिया है इसलिये अब मै आपके इस लोक में नही रह सकती हूं । मेरे पुत्र पाबूजी कि रक्षार्थ व सहयोग हेतु मै दुबारा एक घोडी ( केशर कालमी ) के रूप में जनम लूगीं । यह कह कर अप्सरा रानी अंतर्ध्यान हो जाती है ।समय बीत गया और पाबूजी महाराज बड़े हो गए,  गुरू समरथ भारती जी द्वारा उन्हें शस्त्रों की दीक्षा दी जाती है । धांधल जी के निधन के बाद नियमानुसार राजकाज उनके बड़े भाई बुङा जी द्वारा किया जाता है ।

● गुजरात राज्य मे आया हुआ गाँव " अंजार " जहाँ पर देवल बाई चारण नाम की एक महिला रहती थी । उनके पास एक काले रंग की घोडी थी, जिसका नाम केसर कालमी था ! उस घोडी की प्रसिद्धि दूर दूर तक फैली हुई थी । उस घोडी को को जायल (नागौर) के जिन्दराव खींची ने डोरा बांधा था, और कहा कि यह घोडी मै लुंगा, यदि मेरी इच्छा के विरूद्ध तुम ने यह घोडी किसी और को दे दी तो मै तुम्हारी सभी गायों को ले जाउगां ।

● एक रात श्री पाबूजी महाराज को स्वप्न आता है और उन्हें यह घोडी (केशर कालमी) दिखायी देती है, सुबह वो इसे लाने का विचार करते है । श्री पाबूजी महाराज अपने खास चान्दा जी, ढ़ेबाजी को साथ में लेकर अंजार के लिये रवाना होते है । अंजार पहुँच ने पर देवल बाई चारण उनकी अच्छी आव भगत करती है, और आने का प्रयोजन पूछती है । श्री पाबूजी महाराज देवल से केशर कालमी को मांगते है, लेकिन देवल उन्हें मना कर देती है, और उन्हें बताती है कि इस घोडी को जिन्दराव खींची ने डोरा बांध रखा है और मेरी गायो के अपहरण कि धमकी भी दी हुई है ।
● यह सुनकर श्री पाबूजी महाराज देवल बाईं चारण को वचन देते है कि तुम्हारी गायों कि रक्षा कि जिम्मेदारी आज से मेरी है, जब भी तुम विपत्ति मे मुझे पुकारोगी अपने पास ही पाओगी, उनकी बात सुनकर के देवल अपनी घोडी उन्हें दे देती है ।
पाणी पवन प्रमाण अम्बर हिंदु धरम।
अब माँ धांधल आण , सिर देस्य गायां सटै।।
घोड़ी जोड़ी पागड़ी,मुंछा तणी मरोड़।
ये पांचु ही राखली पाबुजी राठौड़ ।।

● श्री पाबूजी महाराज के दो बहिने थी, पेमलबाई और सोनल बाई ! जिन्दराव खींची का विवाह श्री पाबूजी महाराज कि बहिन पेमल बाई के साथ होता है, और सोनल बाई का विवाह सिरोही के महाराजा सूरा देवडा के साथ होता है ।
जिन्दराव शादी के समय दहेज मे केशर कालमी कि मांग करता है, जिसे श्री पाबूजी महाराज के बडे भाई बूढा जी द्वारा मान लिया जाता है, लेकिन श्री पाबूजी महाराज घोडी देने से इंकार कर देते है, इस बात पर श्री पाबूजी महाराज का अपने बड़े भाई के साथ मनमुटाव हो जाता है । अमर कोट के सोढा सरदार सूरज मल जी कि पुत्री फूलवन्ती बाई का रिश्ता श्री पाबूजी महाराज के लिये आता है, जिसे श्री पाबूजी महाराज सहर्ष स्वीकार कर लेते है, तय समय पर श्री पाबूजी महाराज बारात लेकर अमरकोट के लिये प्रस्थान करते है ।


● कहते है कि पहले ऊंट के पांच पैर होते थे इस वजह से बारात धीमे चल रही थी, जिसे देख कर श्री पाबूजी महाराज ने ऊंट के बीच वाले पैर के नीचे हथेली रख कर उसे ऊपर पेट कि तरफ धकेल दिया जिससे वह पेट मे घुस गया, आज भी ऊंट के पेट पर पांचवे पैर का निशान है । 

● इधर देवल चारणी कि गायो को जिन्दराव खींची ले जाता है, देवल बाईं चारण काफी मिन्नते करती है लेकिन वह नही मानता है, और गायो को जबरन ले जाता है । देवल चारणी एक चिडिया का रूप धारण करके अमर कोट पहूँच जाती है, और वहाँ पर खड़ी केसर कालमी घोड़ी हिन्-हिनाने लगती है । अमर कोट में उस वक्त श्री पाबूजी महाराज की शादी में फेरो की रस्म चल रही होती है तीन फेरे ही लिए थे की चिडिया के वेश में देवल बाई चारण ने वहा रोते हुए आप बीती सुनाई ! उसकी आवाज सुनकर पाबूजी का खून खोल उठा और वे रस्म को बीच में ही छोड़ कर युद्ध के लिए प्रस्थान करते है । उस दिन से राजपूतो में आधे फेरो (चार फेरों ) का  रिवाज चल पड़ा है ।
● पाबूजी महाराज अपने जीजा जिन्दराव खिंची को ललकारते है, वहा पर भयानक युद्ध होता है,  श्री पाबूजी महाराज अपने युद्ध कोशल से जिन्दराव खिंची को परस्त कर देते है, लेकिन बहिन के सुहाग को सुरक्षित रखने व माँ को दिये वचन के लिहाज से जिन्दराव को जिन्दा छोड़ देते है । और सभी गायो को लाकर वापस देवल बाईं चारण को सोप देते है, और अपनी गायो को देख लेने को कहते है, देवल बाई चारण कहती है की एक बछडा कम है । पाबूजी महाराज वापस जाकर उस बछड़े को भी लाकर दे देते है ।
● श्री पाबूजी महाराज रात को अपने गाँव गुन्जवा में विश्राम करते है तभी रात को जिन्दराव खींची अपने मामा फूल दे भाटी के साथ मिल कर सोते हुए पर हमला करता है ! जिन्दराव के साथ पाबूजी महाराज का युद्ध चल रहा होता है और उनके पीछे से फूल दे भाटी वार करता है, और इस प्रकार श्री पाबूजी महाराज गायो की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे देते है । पाबूजी महाराज की रानी फूलवंती जी , व बूढा जी की रानी गहलोतनी जी व अन्य राजपूत सरदारों की राणियां अपने अपने पति के साथ सती हो जाती है, कहते है की बूढाजी की रानी गहलोतनी जी गर्भ से होती है । हिन्दू शास्त्रों के अनुसार गर्भवती स्त्री सती नहीं हो सकती है  इस लिए उन्होंने अपना पेट कटार से काट कर पेट से बच्चे को निकाल कर अपनी सास को सोंप कर कहती है की यह बड़ा होकर अपने पिता व चाचा का बदला जिन्दराव से जरूर लेगा, यह कह कर वह सती हो जाती है । कालान्तर में वह बच्चा झरडा जी ( रूपनाथ जो की गुरू गोरखनाथ जी के चेले होते है ) के रूप में प्रसिद्ध होते है तथा अपनी भुवा की मदद से अपने फूफा को मार कर बदला लेते है और जंगल में तपस्या के लिए निकल जाते है । झरडो पाबु हूं ही करड़ो ।।

👏👏👏👏👏जय #पाबुजी री👏👏👏👏👏

लोक देवता पाबूजी राठौड़
लोक देवता पाबूजी राठौड़
 
स्रोत-सुमेर सिंह भाटी थार की लोकसंस्कृति FB PAGE
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लोकदेवता पनराज जी भाटी का जीवन परिचय(LOKDEVTA PANRAJ JI )-Rajasthan Gk

लोकदेवता पनराज जी भाटी का जीवन परिचय(LOKDEVTA PANRAJ JI )

एक ऐसा वीर क्षत्रिय ..........जिसका एक स्मारक जैसलमेर में हैं तो दूसरा #पाकिस्तान के बहावलपुर में .......
#ब्राह्मणों_की_गायों_के_लिए_बारह_कोस_बिना_सिर_के_लड़ने_वाला_वीर #पनराज जी की कहानी

श्री पनराज जी भाटी का जीवन परिचय ----

राजा विजयराज लांझा (जिनको "उत्तर भड़ किवाड़" की पदवी मिली थी ) के द्वितीय पुत्र राहड़जी (रावल भोजदेव के छोटे भाई), राहड़जी के भूपतजी, भूपतजी के अरड़कजी, अरड़कजी के कांगणजी व कांगणजी के पुत्र के रूप में व माता देवकंवर की कोख से वीर पनराज का जन्म 13वीं सदी के अंतिम चरण में हुआ | श्री पनराज जी जैसलमेर महारावल घड़सी जी के समकालीन थे तथा वे उनके प्रमुख सलाहकार भी थे, क्षत्रियोचित संस्कारो से अलंकृत पनराज जी बचपन से ही होनहार व विशिष्ट शोर्य व पराक्रम की प्रतिमुर्ति थे,श्री पनराजजी ने घड़सीजी सन 1378 ईस्वी में बंगाल अभियान में भाग लेकर गजनी बुखारे के बादशाह के इक्के की मल्लयुद्ध में उसकी भुजा उखाड़कर उसे पराजित कर अपने अद्भुत शोर्य का परिचय दिया, जिससे प्रसन्न होकर बादशाह ने घड़सी जी को "गजनी का जैतवार" का खिताब दिया.


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 शूरवीर पनराज जी भाटी का बलिदान --

एक दिन की बात हैं, काठौड़ी गांव में वीर पनराजजी की धर्मबहिन पालीवाल ब्राह्मण बाला रहती थी, एक दिन पनराजजी अपनी धर्म बहन से मिलने काठौड़ी गांव गए तो उन्होंने देखा कि कई मुसलमान वहां लूटपाट करके उनकी गायों को ले जा रहे थे ,लोगो की चीख पुकार सुन व अपनी धर्म बहिन को रोते देख उस रणबांकुरे की त्यौरियां चढ़ गई व भृकुटी तन गई, वीर पनराजजी ने अपनी बहिन व समस्त लोगों को वचन दिया कि मैं तुम्हारी पूरी गायें वापस ले आऊंगा..उनकी बहिन ब्राह्मण बाला ने पनराज को युद्ध में जाने से रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन यह तो क्षत्रियता की परीक्षा थी जिसमें वीर पनराज जैसा रणबांकुरा कैसे पीछे हट सकता था | शूरवीर पनराज अपने नवलखे तुरंग पर सवार होकर दुश्मन की दिशा मेँ पवन वेग से बढ़ चले ,घमासान युद्ध छिड़ गया, शूरवीर पनराज की तलवार दुश्मनों के रक्त से प्यास बुझाती हुई उन्हे यमलोक भेज रही थी | वीर पनराज के हुँकारो से सारा वातावरण गुंजायमान हो रहा था..

पनराज के रणकौशल से शत्रु सेना मे भगदड़ मच गई, तुर्क मौत को नजदीक पाकर गायों को छोड़कर भागने लगे, वीर पनराज सम्पूर्ण गायों को मुक्त करवाकर विजयी चाल से वापस लौट रहा था, वीर की धर्मबहिन ब्राह्मण बाला अपने भाई की जीत की खुशी में फूला नही समा रही थी, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है, विधाता को कुछ और ही मंजुर था, एक तुर्क ने छल कपट से काम लेते हुए पीछे से वार कर वीर पनराज का सिर धड़ से अलग कर दिया | लेकिन यह क्या...वीर पनराज का बिना सिर का धड़ अपने दोनों हाथो से तलवार चलाकर शत्रुओं के लिए प्रलय साबित हो रहा था | सिर कट जाने के बाद भी तुर्कों को मौत के घाट उतारता हुआ शूरवीर का सिर बारह कोस तक बहावलपुर (पाक) तक चला गया ,वीर पनराज की तलवार रणचण्डी का रूप धारण कर शत्रुओं के रक्त से अपनी प्यास बुझा रही थी, तुर्को मे त्राहि-त्राहि मच गई और वे अल्लाह-अल्लाह चिल्लाने लगे, तब किसी वृद्ध तुर्क की सलाह पर वीर पनराज के शरीर पर नीला(गुळी) रंग छिड़क दिया गया ,वीर पनराज का शरीर ठंडा पड़कर धरती मां की गोद मे समा गया, उसी स्थान (बहावलपुर) पर वीर पनराज का स्मारक बना हुआ है जहां मुस्लिम उनकी 'मोडिया पीर' व 'बंडीया पीर' के नाम से पूजा करते है | प्रणवीर पनराज ने क्षात्र धर्म का पालन करते हुए गौ माता व ब्राह्मणों की रक्षार्थ अपना बलिदान दिया तथा अपने पूर्वज विजयराज लांझा से प्राप्त पदवी " उत्तर भड़ किवाड़ भाटी " को गौरवान्वित किया |यह एक विडम्बना ही रही या तत्कालीन शासकों की लेखन कार्यों में अरुचि कह सकते है कि शूरवीर पनराज की शौर्य गाथा जहां इतिहास के स्वर्णिम पन्नो में लिखी जानी थी वो स्थानीय चारण-भाट कवियों तक ही सीमित रह गई |महारावल घड़सी जी को जैसलमेर की राजगद्दी पर बिठाने में पनराज जी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी, घड़सी जी ने पनराज जी का सम्मान करते हुए उन्हें सोनार दुर्ग के उतर नें सूली डूंगर पर स्थित भुर्ज प्रदान की जँहा वर्तमान में देवस्थान स्थित है | महारावल घड़सीजी ने पनराज जी को 45 कोस की सीमा मे घोड़ा घुमाने पर उन्हें 45 कोस की जागीर दी जो क्षैत्र अाज राहड़की के नाम से जाना जाता है तथा यहां राहड़ भाटियों के गांव स्थित है|स्वयं पनराजजी द्वारा निर्मित पनराजसर तालाब , जहां उनका सिर गिरा था उस स्थान पर पीले रंग की मूर्ति स्वतः प्रकट हुई,इसी स्थान पर वर्ष में दो बार भाद्रपद व माघ सुदी दशम को भव्य मेला लगता है तथा हजारों श्रदालु यहां मन्नत मांगने आते है व दादाजी उनकी मुरादे पूरी करते है|


रज उडी रजथाँण री, ग्रहया नर भुजंग |
दुश्मण रा टुकड़ा किया, रंग राहड़ पन्नड़ ||

पूछे सारथी, भू पर किसरो भाण।
जुझारू जदु वंश रो, चमके गढ़ जैसाण ।।

लोकदेवता पनराज जी

लोकदेवता पनराज जी
लोकदेवता पनराज जी
स्रोत-सुमेर सिंह भाटी थार की लोकसंस्कृति FB PAGE
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Saturday, September 7, 2019

HOW TO OPEN ONLINE NPS TIER 2 ACCOUNT

HOW TO OPEN ONLINE NPS TIER 2 ACCOUNT

NPS KA TIER 2 ACCOUNT KAISE OPEN KARE-

1. Active tier 1 is prerequisite to open tier 2 Account
2. Tier 2 Account can also be activated through your Office/POP


HOW TO OPEN ONLINE NPS TIER 2 ACCOUNT
nps app

Investment option of Tier 2

  • can be same as tier 1
  • can be changed
  • can be different from tier 1

Bank &Nomination Details

  • Can be same as tier 1
  • Can be different from tier1

Benefits of tier 2 Account

  • No need maintain separate account
  • No additional Annual Maintenance Charges(AMC)
  • Better Returns

STEPS TO OPEN ONLINE NPS TIER 2 ACCOUNT


Step 1: Visit the www.enps.nsdl.com Click on “Tier II activation” tab.

HOW TO OPEN ONLINE NPS TIER 2 ACCOUNT
HOW TO OPEN ONLINE NPS TIER 2 ACCOUNT

Step 2: After clicking on Tier II activation, a window opens which asks for details like Permanent Retirement Account Number, Date of Birth and PAN.Here, one has to click on “Verify PRAN”. Once this PRAN is verified with the Tier I account details, his Tier II account will be activated.


HOW TO OPEN ONLINE NPS TIER 2 ACCOUNT
HOW TO OPEN ONLINE NPS TIER 2 ACCOUNT

 Fund Managers of  NPS Tier 2 Account


  • HDFC Pension management company
  • ICICI Prudential Pension Fund
  • Kotak Mahindra Pension Fund
  • SBI Pension Fund
  • UTI Retirement Solutions
  • LIC Pension Fund
  • Reliance Pension Fund

Points to remember before opening a Tier II account-

i. Note that a Tier I and Tier II account can also be opened together by submitting a composite application form.
ii. One can withdraw any amount from the Tier II account at any time without paying any penalty.
iii. Any contribution made towards Tier II accounts are not eligible for 80C deduction.
iv. Minimum amount mandatory for opening an NPS Tier II is Rs. 1000.

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Wednesday, April 17, 2019

CHITTAURGARH RAJASTHAN-THE EPITOME OF ROMANCE AND VALOUR

CHITTAURGARH  RAJASTHAN-THE EPITOME OF ROMANCE AND VALOUR

The pride and glory of rajasthan,chittaur echoes with the talles of romance and valour unique to the rajput tradition. A ruined citadel, where the royal past lives in its imposing forts,graceful palaces and spectacular chhatris.

This fortified settlement has been ravaged thrice and each time the outcome was 'jauhar' -when women immolated themselves on a huge funeral pyre while men donned in saffron robes of martyrdom rode out of the fort towards a certain death.

Alauddin khilji was the first to sack chittaur in 1303 A.D., overpowered by a passionate desire to possess the regal beauty, queen padmini. Legend has it,that she saw her face in the reflection of a mirror and was struck by her mesmerising beauty. But the noble queen preferred death to dishonour and committed 'jauhar'.

In 1533 A.D., during the rule of Bikramjeet ,came the second attack from Bahadur shah,the sultan of gujarat. Once again jauhar was led by rani karnavati, a Bundi princess. Her infant son,Udai singh was smuggled out of chittaur to Bundi who survived to inherit the thorne of the citadel . He learnt from his traumatic childhood that discretion is preferred to valour. So, in 1567 A.D., when the Mughal Emperor invaded Chittaur, Udai Singh fled to establish a new Capital, Udaipur -a beautiful lake city, leaving behind Chittaur to be defended by two 16 year old heroes, Jaimal Qf Bednore and Patta of Kelwa. These young men displayed true Rajput chivalry and died after 'Jauhar' was performed. Immediately thereafter Akbar razed the fort to a rubble.

Chittaur was never inhabited again but it always asserted the heroic spirit of Rajput warriors.


PRIME SITES -

CHITTAURGARH FORT RAJASTHAN

CHITTAURGARH FORT

The Fort : The indomitable pride of Chittaur. the fort is a massive structure with many gateways built by the later Mnurya rulers in 7th century A.D. Perched on a height of 180 m high hill, it sprawls over 700 acres. The tablets and chhatris within are impressive reminders of the Rajput heroism.

The main gates are Padal Pol, Bhairon Pol, Hanuman Pol and Ram Pol. The fort has many magnificent monuments all fine examples of the Rajput architecture. The ancient ruins of the fort are worth Spending few moments in solitude. 


Vijay Stambh (Victory Tower):

                            

Vijay Stambh
Vijay Stambh
The imposing 37 metre high structure with nine storeys, covered with exquisite sculptures of hindu deities and depicting episodes from the two great epics-Ramayana and Mahabharatha.

It was built in 1440 A.D. by Maharana Kumbha, a powerful ruler of Mewar, to commemorate his victory over the muslim rulers of malwa and Gujarat.

Kirti Stambh (Tower of Fame): The 22 metres high tower built by a wealthy Jain merchant in the 12th century A.D. The tower is dedicated to Adinathji, the first of the Jain Tirthankaras and is decorated with figures of the Jain pantheon.
Kirti Stambh
Kirti Stambh 

Rana Kumbha's Palace:
Rana Kumbha's Palace

              Rana Kumbha's Palace

The ruined ediflce of great historical and architectural interest, being the most massive monument in the fort of Chittaur. The palace is believed to have underground cellars where Rani Padmim' and other women committed Jauhar.


Rani Padmini's Palace: 
Built beside a pool, the palace is a magnificent one. It was here that Rana Ratan Singh showed a glimpse of queen Padmini to Alauddin Khilji.
Rani Padmini's Palace
Rani Padmini's Palace

Rani Padmini stood in a 'Zanana Mahal' a pavilion in the centre and her reflection was visible to Alauddin Khilji in a mirror placed in the main hall. After having a glimpse of the legendary beauty, Alauddin went to the extent of ravaging Chittaur in order to possess her.

Kumbha Shyam Temple: 

Kumbha Shyam Temple
Kumbha Shyam Temple
Built during the reign of Rana Kumhha in the IndoAryan style. the temple is associated with the mystic poetess Meerabai an ardent Krishna devotee. She was the wife of Prince Bhojraj



Kalika Mata Temple:

Kalika Mata Temple

                          Kalika Mata Temple

Originally built as a Sun Temple in the 8th century, the temple was later converted into Kalika Mata Temple in the 14th century A.D., dedicated to the mother Goddess Kali the symbol of power and valour.


Government Museum: The magnificent Fateh Prakash Mahal, presently a fine Museum with an exquisite example of sculptures from temples and buildings in the fort is worth a visit. Entry fee Rs. 2.00. Closed on Fridays.


Fateh Prakash Mahal
Fateh Prakash Mahal

Jaymal and Patta Palaces: 

The ruins of palaces of Rathore Jaimal and Sisodia Patta we

witness to the gallantry
of these great warriors.



Gardens and Parks:
Gardens and Parks

Pratap Park, Meera Park and Nehru Park are beautifully laid out parks in lush surroundings. Beautiful Khwaja rose garden at Sawa is just 13 km from Chittaur. 



Meerabai Temple:

The temple where Meerabai worshipped lord Krishna is built in north indian on a raised plinth with a conical roof and beautiful inner sanctum.An open colonnade around the sanctum has four small pavilions in each corner.
Meerabai Temple




EXCURSIONS-

Nagari (20km): one of the oldest towns of Rajasthan of great importance during the mauryan period, is situated on the banks of River bairach. The Hindu and Buddhist remains from the Mauryan and Gupta period are found here.

Bassi Village(25km):Enrouute Bundi is a marvellous village with historical forts, temples and kunds. Especially famous are its sculptures and woodcraft .A place of great tourist interest.

Bassi Wildlife Sanctuary:  50 Sq. km  sanctuary near Bassi, supports a population  of panthers, wild boars. antelopes, mongoose and migratory birds. prior permission has to be obtained from the district forest officer, chittaurgarh before visiting the sanctuary.

Sanwariyaji temple(40 km): On the Chittaur-Udaipur road is a contemporary temple of Lord Krishna, an important pilgrimage spot.

Matri Kundia Temple(50 km): A popular sacred place dedicated to Lord Shiva. Popularly called 'Haridwar of Mewar'.


Bijaipur (40 km): A marvellous castle built by Rao Shakti Singh, the younger brother of Maharana Pratap, stands in the village. Presently, it has been converted into a heritage hotel.

Sita Mata Sanctuary, Dhariyavad :This thickly wooded jungle sprawls over the Aravalli ranges and the Malwa plateau with three rivers flowing through the forest. According to the legend, Sita, wife of Lord Rama stayed in this Jungle in Rishi Valmiki's Ashram after she was exiled by Lord Rama.
The common fauna that can be sighted here includes leopard, hyena, jungle fox, porcupine, sambhar, wild boar, four horned antelope, nilgai and flying squirrel. 

Deogarh(125 km): A 16th century magnificent fon near Pratapgarh with some beautiful palaces ornate with murals and splendid Jain temples.


Menal (90 km): On the Bundi-Chittaur road amid the natural beauty is Menal, famous for its ancient Shiva temples, picturesque water falls and dense forests.

Shopping :-
The beautiful wooden toys made in Bassi village near Chittaurgarh are the best buys. Besides these, there are thewa articles of Pratapgarh, printed fabric of Akola and leather mojri of Gangrar. favourite shopping include sadar bazaar, Rana sanga market, new cloth market, fort road market,gandhi chowk and station circle.

महत्त्वपूर्ण परीक्षा उपयोगी राजस्थान GK----


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Monday, April 8, 2019

SHRI KAPIL MUNI JI KA MELA KOLAYAT BIKANER (कपिल मुनिजी का मेला श्री कोलायत,बीकानेर)

SHRI KAPIL MUNI JI KA MELA  KOLAYAT BIKANER (कपिल मुनिजी का मेला श्री कोलायत,बीकानेर) -

SHRI KAPIL MUNI JI KA MELA  KOLAYAT BIKANER (कपिल मुनिजी का मेला श्री कोलायत,बीकानेर)
कपिल मुनिजी

● बीकानेर से करीब करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित श्री कोलायतजी हिन्दू और सिक्खों की श्रद्धा और भक्ति का केन्द्र है। 

इस स्थान पर कपिल मुनि ने तपस्या की थी। महर्षि कपिल महर्षि कर्दम के पुत्र थे। उन्होंने अपनी माता देवहूति को लौकिकता व अलौकिकता, भक्ति योग, अष्टांग योग का उपदेश दिया तथा सांख्य दर्शन की संरचना की। कपिल मुनि को भगवान विष्णु का अवतार मानकर पूजा जाता है। 



श्री कोलायत,बीकानेर
श्री कोलायत,बीकानेर

● कहा जाता है कि उन्होंने श्रीकोलायत में पीपल के एक पेड़ के नीचे शरीर समर्पित किया था। यहां स्थित सरोवर के आसपास
पीपल के काफी पेड़ है। सरोवर पर पुष्कर की तरह घाट बने हुए है। इस स्थान की मान्यता तीर्थ स्थल के रूप में है। सरोवर के पास ही महर्षि कपिल देव का निज मंदिर है। इसमें काले संगमरमर की गरूड़ व वशिष्ठजी की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। 
पंच मंदिर और गंगा मैया मंदिर भी देखने लायक है। दूसरी तरफ सिक्खों के लिए भी यह केन्द्र आस्था का केन्द्र है। यहां गुरुनानक देवजी ने यात्रा की थी। यहां बड़ा गुरुद्वारा भी है। 



श्री कोलायत
श्री कोलायत तालाब ,बीकानेर
 

● प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा को यहां मेला आयोजित होता है। कोलायत शुष्क क्षेत्र में स्थित है।

●  यहाँ 52 'घाटों वाली एक झील है जो चारों ओर बरगद के पेड़ से आच्छादित है। यहाँ कपिल मुनि को समर्पित एक मंदिर कपिल मुनि घाट पर स्थित है जिसमें इस महान संत की संगमरमर की प्रतिमा स्थापित है।

● इस मेले के दौरान शाम को सरोवर में दीपदान होता है। इसके अतिरिक्त कई खास मौकों पर भी यहां लोग डुबकी लगाने पहुंचते है। गुरुनानक जयंती पर्व होने के कारण इस दिन सिख भी बड़ी संख्या में यहां आते है।

● इस स्थान पर धार्मिक आयोजन के साथ साथ पशु मेले का भी संयोजन किया जाता है। इस पशु मेले में भैंस, ऊंट, घोड़े और मवेशी बेचे जाते हैं। मेले में श्रेष्ठ पशु प्रजानकों को प्रमाण पत्र और पुरस्कार दिया जाता है। 

● कोलायत बीकानेर शहर के दक्षिण-पश्चिम में 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ बीकानेर से कोलायत के लिए एक सीधा रेल मार्ग है। नियमित बसें बीकानेर से कोलायत के लिए चलती हैं। 



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