Skip to main content

लोकदेवता पनराज जी भाटी का जीवन परिचय(LOKDEVTA PANRAJ JI )

लोकदेवता पनराज जी भाटी का जीवन परिचय(LOKDEVTA PANRAJ JI )

एक ऐसा वीर क्षत्रिय ..........जिसका एक स्मारक जैसलमेर में हैं तो दूसरा #पाकिस्तान के बहावलपुर में .......
#ब्राह्मणों_की_गायों_के_लिए_बारह_कोस_बिना_सिर_के_लड़ने_वाला_वीर #पनराज जी की कहानी

श्री पनराज जी भाटी का जीवन परिचय ----

राजा विजयराज लांझा (जिनको "उत्तर भड़ किवाड़" की पदवी मिली थी ) के द्वितीय पुत्र राहड़जी (रावल भोजदेव के छोटे भाई), राहड़जी के भूपतजी, भूपतजी के अरड़कजी, अरड़कजी के कांगणजी व कांगणजी के पुत्र के रूप में व माता देवकंवर की कोख से वीर पनराज का जन्म 13वीं सदी के अंतिम चरण में हुआ | श्री पनराज जी जैसलमेर महारावल घड़सी जी के समकालीन थे तथा वे उनके प्रमुख सलाहकार भी थे, क्षत्रियोचित संस्कारो से अलंकृत पनराज जी बचपन से ही होनहार व विशिष्ट शोर्य व पराक्रम की प्रतिमुर्ति थे,
श्री पनराजजी ने घड़सीजी सन 1378 ईस्वी में बंगाल अभियान में भाग लेकर गजनी बुखारे के बादशाह के इक्के की मल्लयुद्ध में उसकी भुजा उखाड़कर उसे पराजित कर अपने अद्भुत शोर्य का परिचय दिया, जिससे प्रसन्न होकर बादशाह ने घड़सी जी को "गजनी का जैतवार" का खिताब दिया.

 शूरवीर पनराज जी भाटी का बलिदान --

एक दिन की बात हैं, काठौड़ी गांव में वीर पनराजजी की धर्मबहिन पालीवाल ब्राह्मण बाला रहती थी, एक दिन पनराजजी अपनी धर्म बहन से मिलने काठौड़ी गांव गए तो उन्होंने देखा कि कई मुसलमान वहां लूटपाट करके उनकी गायों को ले जा रहे थे ,लोगो की चीख पुकार सुन व अपनी धर्म बहिन को रोते देख उस रणबांकुरे की त्यौरियां चढ़ गई व भृकुटी तन गई, वीर पनराजजी ने अपनी बहिन व समस्त लोगों को वचन दिया कि मैं तुम्हारी पूरी गायें वापस ले आऊंगा..उनकी बहिन ब्राह्मण बाला ने पनराज को युद्ध में जाने से रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन यह तो क्षत्रियता की परीक्षा थी जिसमें वीर पनराज जैसा रणबांकुरा कैसे पीछे हट सकता था | शूरवीर पनराज अपने नवलखे तुरंग पर सवार होकर दुश्मन की दिशा मेँ पवन वेग से बढ़ चले ,घमासान युद्ध छिड़ गया, शूरवीर पनराज की तलवार दुश्मनों के रक्त से प्यास बुझाती हुई उन्हे यमलोक भेज रही थी | वीर पनराज के हुँकारो से सारा वातावरण गुंजायमान हो रहा था..

पनराज के रणकौशल से शत्रु सेना मे भगदड़ मच गई, तुर्क मौत को नजदीक पाकर गायों को छोड़कर भागने लगे, वीर पनराज सम्पूर्ण गायों को मुक्त करवाकर विजयी चाल से वापस लौट रहा था, वीर की धर्मबहिन ब्राह्मण बाला अपने भाई की जीत की खुशी में फूला नही समा रही थी, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है, विधाता को कुछ और ही मंजुर था, एक तुर्क ने छल कपट से काम लेते हुए पीछे से वार कर वीर पनराज का सिर धड़ से अलग कर दिया | लेकिन यह क्या...वीर पनराज का बिना सिर का धड़ अपने दोनों हाथो से तलवार चलाकर शत्रुओं के लिए प्रलय साबित हो रहा था | सिर कट जाने के बाद भी तुर्कों को मौत के घाट उतारता हुआ शूरवीर का सिर बारह कोस तक बहावलपुर (पाक) तक चला गया ,वीर पनराज की तलवार रणचण्डी का रूप धारण कर शत्रुओं के रक्त से अपनी प्यास बुझा रही थी, तुर्को मे त्राहि-त्राहि मच गई और वे अल्लाह-अल्लाह चिल्लाने लगे, तब किसी वृद्ध तुर्क की सलाह पर वीर पनराज के शरीर पर नीला(गुळी) रंग छिड़क दिया गया ,वीर पनराज का शरीर ठंडा पड़कर धरती मां की गोद मे समा गया, उसी स्थान (बहावलपुर) पर वीर पनराज का स्मारक बना हुआ है जहां मुस्लिम उनकी 'मोडिया पीर' व 'बंडीया पीर' के नाम से पूजा करते है | प्रणवीर पनराज ने क्षात्र धर्म का पालन करते हुए गौ माता व ब्राह्मणों की रक्षार्थ अपना बलिदान दिया तथा अपने पूर्वज विजयराज लांझा से प्राप्त पदवी " उत्तर भड़ किवाड़ भाटी " को गौरवान्वित किया |यह एक विडम्बना ही रही या तत्कालीन शासकों की लेखन कार्यों में अरुचि कह सकते है कि शूरवीर पनराज की शौर्य गाथा जहां इतिहास के स्वर्णिम पन्नो में लिखी जानी थी वो स्थानीय चारण-भाट कवियों तक ही सीमित रह गई |महारावल घड़सी जी को जैसलमेर की राजगद्दी पर बिठाने में पनराज जी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी, घड़सी जी ने पनराज जी का सम्मान करते हुए उन्हें सोनार दुर्ग के उतर नें सूली डूंगर पर स्थित भुर्ज प्रदान की जँहा वर्तमान में देवस्थान स्थित है | महारावल घड़सीजी ने पनराज जी को 45 कोस की सीमा मे घोड़ा घुमाने पर उन्हें 45 कोस की जागीर दी जो क्षैत्र अाज राहड़की के नाम से जाना जाता है तथा यहां राहड़ भाटियों के गांव स्थित है|स्वयं पनराजजी द्वारा निर्मित पनराजसर तालाब , जहां उनका सिर गिरा था उस स्थान पर पीले रंग की मूर्ति स्वतः प्रकट हुई,इसी स्थान पर वर्ष में दो बार भाद्रपद व माघ सुदी दशम को भव्य मेला लगता है तथा हजारों श्रदालु यहां मन्नत मांगने आते है व दादाजी उनकी मुरादे पूरी करते है|


रज उडी रजथाँण री, ग्रहया नर भुजंग |
दुश्मण रा टुकड़ा किया, रंग राहड़ पन्नड़ ||

पूछे सारथी, भू पर किसरो भाण।
जुझारू जदु वंश रो, चमके गढ़ जैसाण ।।

लोकदेवता पनराज जी

लोकदेवता पनराज जी
लोकदेवता पनराज जी
स्रोत-सुमेर सिंह भाटी थार की लोकसंस्कृति FB PAGE

Comments

Popular posts from this blog

" पोमचा "- राजस्थान की एक प्रकार की ओढ़नी

"पोमचा" - राजस्थान की एक प्रकार की ओढ़नी राजस्थान में स्त्रियों की ओढ़नियों मे तीन प्रकार की रंगाई होती है- पोमचा, लहरिया और चूंदड़। पोमचा पद्म या कमल से संबद्ध है, अर्थात इसमें कमल के फूल बने होते हैं। यह एक प्रकार की ओढ़नी है।वस्तुतः पोमचा का अर्थ कमल के फूलके अभिप्राय से युक्त ओढ़नी है। यह मुख्यतः दो प्रकार से बनता है- 1. लाल गुलाबी 2. लाल पीला। इसकी जमीन पीली या गुलाबी हो सकती है।इन दोनो ही प्रकारों के पोमचो मेंचारो ओर का किनारा लाल होता है तथा इसमें लाल रंगसे ही गोल फूल बने होते हैं। यह बच्चे के जन्म के अवसर पर पीहर पक्ष की ओरसे बच्चे की मां को दिया जाता है।पुत्र का जन्म होने पर पीला पोमचा तथा पुत्री के जन्म पर लाल पोमचा देने का रिवाज है। पोमचा राजस्थान मेंलोकगीतों का भी विषय है।पुत्र के जन्म के अवसर पर "पीला पोमचा" का उल्लेख गीतों में आता है। एक गीत के बोल इस तरह है-                          "पोमचा" - राजस्थान की एक प्रकार की ओढ़नी " भाभी पाणीड़े गई रे तलाव में, भाभी सुवा तो पंखो बादळ झुकरया जी।      देवरभींजें तो भींजण दो ओदेवर और रंगावे म्हा

World famous sword of Sirohi-विश्व विख्यात सिरोही की तलवार

सिरोही की तलवार को पहचान दिलाने वाले परिवार में सबसे बुजुर्ग प्यारेलाल के हाथों में आज भी वह हुनर मौजूद है जो पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हें मिलता रहा और जिसकी बदौलत सिरोहीं की तलवार को देश दुनिया में पहचान मिली | 62 वर्षीय प्यारेलाल कई सालों से तलवारें बना रहे है , लेकिन फिर भी जब भी मौका मिलता है वे तलवार को ढालने लगते है |आज भी लोहे पर ऐसी सटीक चोट करते है की तलवार की धार वैसी ही जैसी कई सालों पहले रहा करती थी |लोग आज भी उन्हें ढूंढते हुए उस गली तक आ पहुचते हैं जहाँ प्यारेलाल तलवार बनाने का काम  करते हैं |पिता की ढलती उम्र और साथ छोड़ते स्वास्थ्य के कारण अहमदाबाद में रहने वाले बेटे ने भी कई बार कहा की आप मेरे साथ चलिए ,लेकिन वे नहीं माने|कहा की जब तक हिम्मत है ये तलवारे बनाता रहूँगा |गौरतलब है की प्यारेलाल इतिहास  की स्वर्णिम पन्नों में दर्ज सिरोही की प्रसिद्ध तलवारे में माहिर परिवार के आखिरी शिल्पकार है |जो रियासत काल से ही तलवार बनाते आ रहे हैं | इस खासियत की वजह से मिली प्रसिधी   सिरोही तलवार की यह खासियत है की आज के मशीनी युग में भी लोहे को गर्म करके सिर्फ हथौड़े की सहायता से तैय

राजस्थान के प्रमुख अनुसंधान केन्द्रो के नाम

1. राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र - सेवर जिला भरतपुर 2. केन्द्रीय सूखा क्षेत्र अनुसंधान संस्थान - CAZRI- जोधपुर 3. केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान - अविकानगर जिला टौंक 4. केन्द्रीय ऊँट अनुसंधान संस्थान - जोहड़बीड़, बीकानेर 5. अखिल भारतीय खजूर अनुसंधान केन्द्र - बीकानेर 6. राष्ट्रीय मरुबागवानी अनुसंधान केन्द्र - बीकानेर 7. राष्ट्रीय घोड़ा अनुसंधान केन्द्र - बीकानेर 8. सौर वेधशाला - उदयपुर 9. राजस्थान कृषि विपणन अनुसंधान संस्थान - जयपुर 10. केन्द्रीय पशुधन प्रजनन फार्म - सूरतगढ़ जिला गंगानगर 11. राजस्थान राजस्व अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान - अजमेर 12. राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान - उदयपुर 13. सुदूर संवेदन केन्द्र - जोधपुर 14. माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं सर्वेक्षण संस्थान - उदयपुर 15. राष्ट्रीय मसाला बीज अनुसंधान केन्द्र - अजमेर 16. राष्ट्रीय आयुर्वेद शोध संस्थान - जयपुर 17. केन्द्रीय इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग शोध संस्थान (सीरी) - पिलानी 18. अरबी फारसी शोध संस्थान - टौंक 19. राजकीय शूकर फार्म - अलवर 20. केन्द्र