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Showing posts from 2016

Major Mountain Strikes in Rajasthan- राजस्थान कि प्रमुख पर्वत चोटियाॅ

Peaks of North-Eastern Aravalli Region 01. Raghunathgarh (Sikar) - 1055 M 02. Khoh (Jaipur) - 920 M 03. Bhairach (Alwar) - 792 M 04. Barwara (Jaipur) - 786 M 05. Babai (Junjhunu) - 780 M 06. Bilali (Alwar) - 775 M 07. Manoharpura (Jaipur) - 747 M 08. Bairath (Jaipur) - 704 M 09. Sariska (Alwar) - 677 M 10. Siravas - 651 M Peaks of Central Aravalli Region 01. Goramji (Ajmer) - 934 M 02. Taragarh (Ajmer) - 870 M 03. Naag Pahar (Ajmer) -795 M Peaks of Southern Aravalli Region 01. Guru Shikhar (Sirohi) - 1722 M 02. Ser (Sirohi) - 1597 M 03. Dilwara (Sirohi) - 1442 M 04. Jarga (Sirohi) - 1431 M 05. Achalgarh (Sirohi) - 1380 M 06. Kumbhalgarh (Rajsamand) - 1224 M 07. Dhoniya - 1183 M 08. Hrishikesh - 1017 M 09. Kamalnath - 1001 M 10. Sajjangarh - 938 M 11. Lilagarh - 874 M TOP 10 PEAKS OF ARAVALLI 01. Guru Shikhar (Sirohi) - 1722 M 02. Ser (Sirohi) - 1597 M 03. Dilwara (Sirohi) - 1442 M 04. Jarga (Sirohi) - 1431 M 05. Achalgarh (Sirohi) - 1380 M 06

Saint sampradaya and folk saints of Rajasthan-राजस्थान के संत सम्प्रदाय एवं लोक संत

राजस्थान के पुरूष लोक सन्त 1. रामस्नेही सम्प्रदाय – इसके प्रवर्तक संत रामचरण दास जी थे। इनका जन्म टोंक जिले के सोड़ा गाँव में हुआ था। इनके मूल गाँव का नाम बनवेडा था। इनके पिता बखाराम व माता देऊजी थी तथा वैश्य जाति के थे। इन्होंने यहाँ जयपुर महाराज के यहाँ मंत्री पद पर कार्य किया था। इसका मूल रामकिशन था। दातंडा (मेवाड़) के गुरू कृपाराम से दीक्षा ली थी। इनके द्वारा रचित ग्रन्थ अर्ण वाणी है। इनकी मृत्यु शाहपुरा (भीलवाड़ा) में हुई थी। जहाँ इस सम्प्रदाय की मुख्यपीठ है। पूजा स्थल रामद्वारा कहलाते हैं तथा इनके पुजारी गुलाबी की धोती पहनते हैं। ढाढी-मूंछ व सिर पर बाल नहीं रखते है। मूर्तिपुजा नहीं करते थे। इसके 12 प्रधान शिष्य थे जिन्होंने सम्प्रदायक प्रचार व प्रसार किया। रामस्नेही सम्प्रदाय की अन्य तीन पीठ 1. सिंहथल बीकानेर, प्रवर्तक – हरिदास जी 2. रैण (नागौर) प्रवर्तक – दरियाआब जी (दरियापथ) 3. खेडापा (जोधपुर) प्रवर्तक संतरामदासजी 2. दादू सम्प्रदाय – प्रवर्तक – दादूदयाल, जन्म गुजरात के अहमदाबाद में, शिक्षा – भिक्षा – संत बुद्धाराम से, 19 वर्ष की आयु में राजस्थान में प्रवेश

Marwar Ghudla Festival-मारवाड़ का घुड़ला त्यौहार

Marwar Ghudla Festival-मारवाड़ का घुड़ला त्यौहार मारवाड़ का घुड़ला त्यौहार मारवाड़ के जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर आदि जिलों में चैत्र कृष्ण सप्तमी अर्थात शीतला सप्तमी से लेकर चैत्र शुक्ला तृतीया तक घुड़ला त्यौहार मनाया जाता है। इस त्यौहार के प्रति बालिकाओं में ज्यादा उत्साह रहता है। घुड़ला एक छिद्र किया हुआ मिट्टी का घड़ा होता है जिसमें दीपक जला कर रखाहोता है। इसके तहत लड़कियाँ 10-15 के झुंड में चलती है। इसके लिए वे सबसे पहले कुम्हार के यहां जाकर घुड़ला और चिड़कली खरीद कर लाती हैं, फिर इसमें कील से छोटे-छोटे छेद करती हैं और इसमें दीपक जला कर रखती है।  इस त्यौहार में गाँव या शहर की लड़कियाँ शाम के समय एकत्रित होकर सिर पर घुड़ला लेकर समूह में मोहल्ले में घूमती है। घुड़ले को मोहल्लें में घुमाने के बाद बालिकाएँ एवं महिलाएँ अपने परिचितों एवं रिश्तेदारों के यहाँ घुड़ला लेकर जाती है। घुड़ला लिए बालिकाएँ घुड़ला व गवर के मंगल लोकगीत गाती हुई सुख व समृद्धि की कामना करती है। जिस घर पर भी वे जाती है, उस घर की महिलाएँ घुड़ला लेकर आई बालिकाओं का अतिथि की तरह स्वागत सत्कार करती हैं। साथ ही माटी के घुड़ले के