सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

Bundi's Farmers Agitation बूंदी काकिसान आंदोलन -


बूंदी का किसान आंदोलन-
राजस्थान में भूमि बंदोबस्त व्यवस्था के बावजूद भी गावों में धीरे-धीरे महाजनों का वर्चस्व बढ़ने लगे। 'साद' प्रथा के अंतर्गत प्रत्येक क्षेत्र में महाजन से लगान की अदायगी का आश्वासन लिया जाने लगा। इस व्यवस्था से किसान अधिकाधिक रूप से महाजनों पर आश्रित होने लगे तथा उनके चंगुल में फंसने लगे। 19 वीं सदी के अंत में व 20 वीं सदी के शुरू में जागीरदारों द्वारा किसानों पर नए-नए कर लगाये जाने लगे और उनसे बड़ी धनराशि एकत्रित की जाने लगी। जागीरदारी व्यवस्था शोषणात्मक हो गई। किसानों से अनेक करों के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के लाग-बाग लेने की प्रथा भी प्रारंभ हो गई। ये लागें दो प्रकार की थी-
1. स्थाई लाग
2. अस्थाई लाग (इन्हें कभी-कभी लिया जाता था।)
इस कारण से जागीर क्षेत्र में किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई जिसके कारण किसानों में रोष उत्पन्न हुआ तथा वे आन्दोलन करने को उतारू हो गए।
बिजोलिया, बेगूं और अन्य क्षेत्र के किसानों के समान ही बूंदी राज्य के
किसानों को भी अनेक प्रकार की लागतों (लगभग 25%), बेगार एवं ऊँची दरों पर लगान की रकम देनी पड़ रही थी। बूंदी राज्य में वसूले जा रहे कई करों के अलावा 1 रुपये पर 1 आने की दर से स्थाई रूप से युद्धकोष के लिए धनराशि ली जाने लगी। किसानों के लिए यह अतिरिक्त भर असहनीय था। किसान राजकीय अत्याचारों से परेशान होने लगे। मेवाड़ राज्य के बिजोलिया में हुए किसान आन्दोलन की कहानियां पूरे राजस्थान में व्याप्त हुई। अप्रेल 1922 में बिजोलिया की सीमा से जुड़े बूंदी राज्य के 'बराड़' क्षेत्र के त्रस्त किसानों ने आन्दोलन प्रारंभ कर दिया। इसीलिए इस आंदोलन को बरड़ किसान आंदोलन भी कहते हैं।
किसानों को 'राजस्थान सेवा संघ' का मार्गदर्शन प्राप्त था। किसानों ने राज्य
की सरकार को अनियमित लाग, बेगार व भेंट आदि देना बंद कर दिया। आन्दोलन का नेतृत्व 'राजस्थान सेवा संघ' के कर्मठ कार्यकर्ता 'नयनू राम शर्मा' कर रहे थे। इनके नेतृत्व में डाबी नामक स्थान पर किसानों का एक सम्मेलन बुलाया। राज्य की ओर से बातचीत द्वारा किसानों की समस्याओं एवं शिकायतों को दूर करने कई प्रयास हुए, किन्तु वे विफल हो गए। तब राज्य की सरकार ने दमनात्मक नीति अपनाना शुरू किया और निहत्थे किसानों पर निर्ममतापूर्वक लाठियां व गोलियां बरसाई गई। सत्याग्रह करने वाली स्त्रियों पर घुड़सवारों द्वारा घोड़े दौड़कर एवं भाले चलाकर अमानवीय अत्याचार किया गया। पुलिस द्वारा किसानों पर की गई गोलीबारी में झण्डा गीत गाते हुए ' नानकजी भील' शहीद हो गए। आन्दोलनकारियों के नेता नयनू राम शर्मा, नारायण लाल, भंवरलाल आदि एवं राजस्थान सेवा संघ के अनेक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर मुकदमे चलाए गए। नयनू राम शर्मा को राजद्रोह के अपराध में 4 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई।
यद्यपि यह आन्दोलन असफल रहा किन्तु इस आन्दोलन से यहाँ के किसानों को कुछ रियायतें अवश्य प्राप्त हुई और भ्रष्ट अधिकारियों को दण्डित किया गया
तथा राज्य के प्रशासन में सुधारों का सूत्रपात हुआ। बूंदी का किसान आन्दोलन राज्य प्रशासन के विरुद्ध था, जबकि मेवाड़ राज्य के बिजोलिया के आन्दोलन में किसानों ने अधिकांशतः जागीर-व्यवस्था का विरोध किया था। बूंदी के किसान आन्दोलन की विशेषता यह थी कि इसमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।


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